राज्य - राजस्थान
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*शीर्षक - - भारत कथा*
मैं बढ़ता ही गया,
नित नए प्रतिमान गढ़ता ही गया।
प्रगति के पथ पर,
उन्नति के रथ पर चढ़ता ही गया।
झेलकर भी सैंकड़ों वर्षों की दासता,
खाकर थपेड़े कालचक्र के,
अभ्यागत बर्बर नृशंसों से लड़ता ही गया।
मैं बढ़ता ही गया,
नित नए प्रतिमान गढ़ता ही गया।
सहस्रों सपूतों की अजस्र बलिदानी धारा से,
काट बेड़ियाँ गुलामी की,
आजादी की लहरों में बहता ही गया।
आए अगणित झंझा जाति, धर्म, संप्रदायों के भेद के,
सबको अपने में समेट चलता ही गया।
मैं बढ़ता ही गया,
नित नए प्रतिमान गढ़ता ही गया।
भ्रातृत्व, समता, सद्भाव, अखंडता का भाव लिए,
धर्म-निरपेक्षता के पथ पर बढ़ता ही गया।
मैं बढ़ता ही गया,
नित नए प्रतिमान गढ़ता ही गया।
*बजरंग लाल सैनी वज्रघन*
*खंडेला जिला सीकर राजस्थान*
मैं बढ़ता है गया ।
ReplyDeleteउत्तम सृजन
"भ्रातृत्व, समता, सद्भाव, अखंडता का भाव लिए,
ReplyDeleteधर्म-निरपेक्षता के पथ पर बढ़ता ही गया।"इन दो पंक्तियों ने कविता में जान डाल दी। धन्य हो गुरु - भारत मां के प्रति आपका अद्भुत प्रेम। 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹
आपका स्नेह
DeleteWaah Guru gajab
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा लिखा है
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