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शीर्षक आशाये
आशाये ।
आशा जीवन को आगे बढ़ाती है ।
कभी हंसाती ,कभी रुलाती है ।
पाने की चाह मन में लिये , यूं ही चलता जाता हूं ।
मृग मारिचा है ,सारा संसार ,हर पल धोखा ,खाता हूं ।
सोचा था कल आज ख़ुश हो जाउंगा ,जब आज मेरे पास है , फिर कल की आशाये
दिल में लिये चलता हूं ।
जीवन बीत जाती है
अधुरी ,आशाये रह जाती है ।
है छोटी सी आशा की हंस लूं ,पर जीन्दगी बड़ी रुलाती है ।
पल में सब देकर , फिर पल में छीन ,लेती है ।
लालच में फंसकर मक्खी गुड़ में जैसे रोता है ।
मनुष्य ,जगत आशा के जाल में फंसकर खुद को भुल जाता है ।
बेहतरीन रचना
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteप्रेरणादायी
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteप्रेरणा युकत रचना है।
ReplyDeleteधन्यवाद
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