क्षेत्र -छत्तीसगढ़
विषय - समय
विधा -कविता
*समय* रुकता नहीं,
किसी ठिकाने में
जिंदगी गुजर जाती है,
साँसों के आने जाने में,
*समय* के धारे में,बह जाता है दर्द भी
रह जाती हैं कुछ यादें शेष
रेत की तरह किरिचती हुई सी
कुरेदती रहती हैं हरदम
सूख नहीं पाता वह घाव
वक्त के साथ भी
रिसता ही रहता है अनवरत
कुछ अच्छा भी होता है उत्सव सा
जब जीवन में समय के साथ
सतरंगी मोती सी यादें बनकर
सुख दुख के कच्चे धागे में
पिरोयी मजबूत माला सी
*समय* से परे निरन्तर
कठिन समय में सकारात्मक
जीवंत प्रेरणा देती
*समय* कभी अच्छा तो बहुत अच्छा
कभी खराब तो बहुत खराब
जीवन में घटने वाली
हर घटना के लिए *समय* उत्तरदायी
क्या यह उचित?
आंशिक हो सकता है,
पूरी तरह नहीं।
क्योकि अपने सपने पूरे करने
सभी को मिलते हैं
प्रत्येक दिन,उतने ही घण्टे,मिनट और पल
किन्तु परिस्थिति ,किस्मत,कर्मठता अलग
अतः पारितोषिक प्रतिफल भी अलग
कुछ सुहाने पल सँजो कर रखना
चाहती हूँ जिन्हें हमेशा के लिए
फिसल जाते हैं हाथों से
बारिश की बूँदों की तरह
देखते ही देखते
बस ताकती रह जाती हूँ मैं
निर्निमेष,
बुलबुले की तरह उड़कर
दूर जाते उन पलों को
--------------
विजिया गुप्ता "समिधा"
दुर्ग - छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment