स्थान - भिलाई 3 (छ.ग.)
संपर्क - 7000858588
शीर्षक - सिर्फ यही
बाँध लूँ मैं मन के भावों को तेरे हाथों की मौली से,
बनके लाकेट लग जाऊं गले ज़रा हँसी ठिठोली से!
हो जाऊं तेरी चुनरी का कोना, संग तेरे उड़ता चलूँ-
दिल नहीं भरता दिन-भर होती आँख मिचौली से!!
राधा का कृष्ण से प्रेम अद्भुत अलौकिक था,
पर मीरा की दीवानगी कभी नहीं दैहिक था!
व्यर्थ के उलझनों को परे रख हमतुम सोचें-
प्रेमनद में बहता जीवन है, बाकी भौतिक था!!
पढ़ लो तुम भी आँखे बंद करके, जो सोचता हूँ,
ना तड़पो उन बातों को, जिन्हें मैं तो भोगता हूँ!
कदम संग चलेंगे तो ताल सबको सुमधुर लगेंगे-
रोक लो वेदना के दर्द अन्दर, जैसे मैं रोकता हूँ!!
बस यही हल है सीधा सरल सा मेरे लिए तो,
तू संग हो हरपल वही नवल सा मेरे लिए तो!
फिर ना हो बातें विछोह की सुप्त मन में भी-
थार में स्वर्ग का सुख तरल सा मेरे लिए तो!!
(C) गिरीश
भिलाई -3 (छ.ग.)
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