पता - दरभंगा, बिहार
विधा - कविता
शीर्षक - नया सवेरा ।
मुड़कर जब देखता हूँ पीछे मैं,
जानें कितने लोग पीछे छूट गये,
कितनी गलियां पीछे छूट गयीं,
कितनी सड़कें नजरों से गुजर गयी ।
जब देखा मुड़कर पीछे मैंने,
जानें कितने घर छूट गये ।
जिन गलियों में बीता बचपन अपना,
आज बेगाने से लगने लगे ।
खेला था संग सबके जिस आँगन में,
आज बहुत वो याद आने लगे ।
दिल करता है, फिर चली जाऊँ, आज उन्हीं राहों पर,
सीखा था मैंने जहाँ पर चलना, दादाजी का हाथ पकड़कर ।
सबसे मिलूँ मैं, गले लगाऊँ,
जो कुछ भूला-बिसरा था मैं,
कान पकड़कर माफी माँगू,
नई सुबह के साथ मैं, नया सवेरा जीवन में लाऊँ ।
सबके साथ मिलजुलकर हर्षोल्लास की लहर फैलाऊँ ।
©प्रेरणा कर्ण, दरभंगा, बिहार
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