Tuesday, December 31, 2019

छत्तीसगढ़ से स्वपन बोस की रचना- शरणार्थी

नाम श्री स्वपन बोस
पता जुगानी केम्प छत्तीसगढ़
शीर्षक- शरणार्थी


            शरणार्थी
एक लकीर का भेद देखो अपने
बिछड़ जाते हैं ।
                 देश टूट जाता है इन्सान शरणार्थी कहलाते हैं ।
सूर्य नहीं करता  भेद ,सबको तपन देता  है ।

      देखो भगवान के जगत में कोई ,भेद नहीं होता है ।

      न जाने ईन्सान को क्या हो गया ,अलग अलग देश बनाता है 

              नहीं जानती नदीया कौन अपना पराया  बहते हुए सबकी प्यास बुझती है ।

   हवा नहीं करती भेदभाव शरणार्थी हो या कोई जीव सबको सांसें देती है ।

 विज्ञान के इस युग में ,सब एक हैं।सात महाद्वीप में  बसें देश सब शांति के लिए नेक है ।

             मनुष्य ही है जो मानवता का प्रतीक है ।
रहे सब मिल जुलकर ये ही मनुष्यता का सिख है ।

       दो दिन की जिन्दगी में ,
        भगवान ने सुन्दर मानव बनाया , है ।
               हो खुशहाल सारी दुनिया , मनुष्य ने परिवार ,समाज
और देश बनाया ।

      शांति के लिए बस प्रेम चाहिए
      प्रेम सब कुछ होता है ।
       फिर क्या हो गया मनुष्य को शांति के लिए न जाने  क्यों लड़ता      
         है ।

          सराय है यह सारा जगत बस यह पल दो पल के लिए ठहरना है ।

       साठ सत्तर साल के लिए यह रहना है । शरणार्थी बनकर ईश्वर के दर एक दिन सबको चले जाना है ।

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