पता जुगानी केम्प छत्तीसगढ़
शीर्षक- शरणार्थी
शरणार्थी
एक लकीर का भेद देखो अपने
बिछड़ जाते हैं ।
देश टूट जाता है इन्सान शरणार्थी कहलाते हैं ।
सूर्य नहीं करता भेद ,सबको तपन देता है ।
देखो भगवान के जगत में कोई ,भेद नहीं होता है ।
न जाने ईन्सान को क्या हो गया ,अलग अलग देश बनाता है
नहीं जानती नदीया कौन अपना पराया बहते हुए सबकी प्यास बुझती है ।
हवा नहीं करती भेदभाव शरणार्थी हो या कोई जीव सबको सांसें देती है ।
विज्ञान के इस युग में ,सब एक हैं।सात महाद्वीप में बसें देश सब शांति के लिए नेक है ।
मनुष्य ही है जो मानवता का प्रतीक है ।
रहे सब मिल जुलकर ये ही मनुष्यता का सिख है ।
दो दिन की जिन्दगी में ,
भगवान ने सुन्दर मानव बनाया , है ।
हो खुशहाल सारी दुनिया , मनुष्य ने परिवार ,समाज
और देश बनाया ।
शांति के लिए बस प्रेम चाहिए
प्रेम सब कुछ होता है ।
फिर क्या हो गया मनुष्य को शांति के लिए न जाने क्यों लड़ता
है ।
सराय है यह सारा जगत बस यह पल दो पल के लिए ठहरना है ।
साठ सत्तर साल के लिए यह रहना है । शरणार्थी बनकर ईश्वर के दर एक दिन सबको चले जाना है ।
अति सुंदर👌👌👌
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