नाम -नलिनी बाजपेयी
शीर्षक-अंतर्मन की प्यास
राज्य - छत्तीसगढ़
मो: नम्बर
अंतर्मन की प्यास
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अंतर्मन की प्यास,न
कैसे बुझाऊं आज,
तुम्हें कैसे बताऊं,
तुम्हें कैसे दिखाऊं मेरे हमराज।
अंतर्मन में ही टूट गया विश्वास,
तुम्हारी यादें जीने नहीं देती,
कैसे जगाऊं जीने की आस।
ये अगहनी धूप,
मखमली अहसास,
बीते दिनों को बनाती है खास।
सागर की लहरें,इंद्रधनुषी घटाएं
आसमान से तारों का टूटना,
अंतर्मन में उठता है अजीब एहसास।
अंतर्मन की प्यास,
लालसाओं का ह्रास
कैसे जिएं भला जीवन है उदास।
जीवन यायावरी बनी
भटक रही है द्वार_द्वार,
खंडित, तृषित है हर विश्वास।
मेरी विवशता पर विकल
वेदना की पड़ी मार,
विश्वासों का टूट रहा आधार।
बता दो कैसे लाऊं मधुमास।
अंतर्मन की प्यास
तोड़ रही है श्वास।
अब बची नहीं है कोई आस।
अंतर्मन की प्यास,
कैसे बुझाऊं आज।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर (छ.ग.)
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