नाम - शैलेन्द्र चेलक
शीर्षक - पीड़ा
सम्पर्क -९०९८५१८९७६
पता - पेंडरवानी , बालोद ,छ. ग.।
पीड़ा
एक बार फिर आँखे नम है ,
दिलों में गम ही गम है ,
दिल के गुबार निकले कैसे ,
कितने ही मोमबत्तियां जलाएं, मोर्चे निकाले कम है ,
न जाने कितने रंगों में ,शक्लों में ,
मुश्किलें ही मुश्किलें हैं ,
तंग सोच है जहां की ,
और उसी जहां पे हम हैं ,
लड़ने का जज़्बा भी है ,
हौसला बुलंद है ,
गिद्धों की भरमार है ,
मददगार चंद है हैं ,
कहीं आग से जलती ,
कहीं दिल जलता है ,
कहीं सिमट कर मिट जाती ,
कहीं मिटाने का सबब पलता है ,
क्यूं तंग गालियां है ,
मिटती कलियां है ,
कानूनों की भरमार है ,
कई रंगरलियां हैं ,
आखिर क्यूं ...आखिर क्यूं ...
( भाषण नही एक्शन चाहिए )
- शैलेन्द्र चेलक -
Nice sir
ReplyDeleteSahi hai sir
ReplyDeleteEkdam sahi sir
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteYou are right sir
ReplyDeleteVery nice sir ji
ReplyDeleteआप सभी का आभार
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