कवि का नाम _ संतोष श्रीवास्तव सम
राज्य छत्तीसगढ
शीर्षक छांव
जीवन में छांव मिले,
मां बाप का,
गुरू जनों का,
सच्चे मित़ों का,
अपनों का,
फिर कहां अकेले,
हम होवे,
कहां अकेलापन,
कोई झेले।
जीवन मे ये छांव,
हर अच्छाई वरती है,
और बुराई हरती है,
जब नही सूछता कुछ तो,
इक राह कहीं से देती है।
बस छांव सदा ये बनी रहे,
फिर कुछ मिले ,
न मिले।
संतोष श्रीवास्तव सम कांकेर छत्तीसगढ।
No comments:
Post a Comment