कवि - संदीप सिंधवाल
शीर्षक - पिता और बिटिया
राष्ट्र - पपुआ न्यू गिनी (भारतीय मूल)
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पिता और बिटिया
वो गुड़िया सबकी नैनों का तारा थी
थकाती जिंदगी की एक सहारा थी।
वक्त बढ़ता चला आगे अपनी रफ्तार
वो गुड़िया भी पहुंच गई सोलह पार।
जमाने के लिए वो कमसिन जवान है
पिता के लिए अब भी वही नादान है।
अब इस रस्ते कम अपनों के हाथ हैं
कहने को तो कुछ गिद्ध भी साथ हैं।
पिता समझाता दुनिया के उसूलों को
बिटिया तो प्यार करती रही फूलों को।
नजरअंदाज करती रही बुरी नजर को
कोई घाट लगाए बैठा तेरी खबर को।
आखिर में हुआ वहीं जैसा कि होता है
पिता भरे कमाने में फूट फूट रोता है।
हर जुबान पर चार दिन चर्चा आम रहेगी
हर बिटिया के लिए डरावनी शाम रहेगी।
स्वागत है श्रीमान् जी
ReplyDeleteआभार आपका
Deleteकाव्य पोस्ट में स्थान देने के लिए धन्यवाद
ReplyDeleteसंदीप सिंधवाल
पपुआ न्यू गिनी
बहुत अच्छी रचना भाई जी
ReplyDeleteबहुत अच्छी रचना भाई जी
ReplyDeleteबढ़िया रचना है....
ReplyDeleteशानदार जबरदस्त
ReplyDeleteKafi kuch bayan kr diya apneee en chan linooo meee bhejeeeee
ReplyDeleteWah wah Kya baat hai. Good start dear, keep it up.
ReplyDeleteBahut sundar Bhai Ji
ReplyDeleteNice lines
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