पता - पेंडरवानी , बालोद ,छ. ग.
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शीर्षक - चिट्ठी मेरे नाम की
चिट्ठी मेरे नाम की
मरणासन पर बैठा मैं ,
सोचता था अंजाम की ,
बहके थे जब मेरे कदम ,
याद आती है उस शाम की ,
टेंसन में था , तो पी ली थी शराब ,
परवाह न की दाम की ,
फिर तो आदत ही बन गया ,
पान-गुटखा के साथ सिगरेट मेरे मुंह पे तन गया ,
मुँह का तो मुखौटा बन गया ,
अमाशय की हालत गंभीर ,
अब क्या सोचूं परिणाम की ,
यही हश्र होता है ,
सबके बुरे काम की ,
लीवर का हालत जर -जर ,
मुँह पे तो माउथ केंसर ,
कही आगे कुछ-एक नारी ,
कहि आगे इस पर नर ,
टी .बी . , कैंसर पीछे पड़े थे ,
यमदूत भी तो डटे खड़े थे ,
शरीर जवाब दे रहा था ,
पर मेरे कर्म होने को अड़े थे ,
नर्स ने जब दवा पिलाई ,
याद आयी पहली जाम की ,
यमराज ने भेजी थी ,
जो चिट्ठी मेरे नाम की ,
अब तो कोई दुआ न लगे ,
दवा न थी काम की ,
यमराज ने भेजी थी ,
जो चिट्ठी मेरे नाम की , चिट्ठी ....
- शैलेन्द्र चेलक -
Nice
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteBahut khub sir ji
ReplyDeleteYour right sir ji.
ReplyDeleteधन्यवाद जी
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