कवि;-सुलोचना परमार "उत्तरांचली"
शीर्षक:- मेरी माँ
सम्पर्क:-
राज्य:- उत्तराखण्ड
शीर्षक:- मेरी माँ
सम्पर्क:-
राज्य:- उत्तराखण्ड
रोली, चंदन ,कुम कुम टीका
हल्दी उबटन मेरी मां।
घर भर में खुशबू सी फैली
धूप, अगरबत्ती मेरी मां।
हल्दी उबटन मेरी मां।
घर भर में खुशबू सी फैली
धूप, अगरबत्ती मेरी मां।
सुबह शाम के भजन कीर्तन
और अजान है मेरी मां।
गुरु ग्रन्थ के हर पन्ने की
गुरुवाणी है मेरी मां।
और अजान है मेरी मां।
गुरु ग्रन्थ के हर पन्ने की
गुरुवाणी है मेरी मां।
सूरज के किरणों जैसी ही
रंग बिरंगी मेरी मां।
तपती दुपहरी हो जाती है
कभी कभी ये प्यारी मां ।
रंग बिरंगी मेरी मां।
तपती दुपहरी हो जाती है
कभी कभी ये प्यारी मां ।
चंदा की चांदनी सी शीतल
कभी हो जाती है मेरी मां।
आसमान में देख के तारे
मन्द मन्द मुस्काती मां ।
कभी हो जाती है मेरी मां।
आसमान में देख के तारे
मन्द मन्द मुस्काती मां ।
पीपल की है छाँव घनेरी
नीम का कडुवा पत्ता मां ।
घर आंगन की तुलसी जैसी
रक्षा करती मेरी मां ।
नीम का कडुवा पत्ता मां ।
घर आंगन की तुलसी जैसी
रक्षा करती मेरी मां ।
तीर्थों का जो तीर्थ धरा पर
तीर्थ राज प्रयाग है मां।
चट्टानों से जो टकराती
वो बहती नदी है मेरी मां।
तीर्थ राज प्रयाग है मां।
चट्टानों से जो टकराती
वो बहती नदी है मेरी मां।

माँ को समर्पित अच्छी रचना
ReplyDelete