कुमार तनसुख
श्रीमाधोपुर राजस्थान।
कविता, शीर्षक :- नारी
सम्पर्क
श्रीमाधोपुर राजस्थान।
कविता, शीर्षक :- नारी
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देह ही नहीं जरा गौर करो
सांस भाव स्पन्दन है ।
उसकी क्या गलती तुम सोचो
उसमें देहिक आर्कषण है ।
अपना समझें आखिर किसको
किससे वह खुलकर बात करें
खिलकर सिमटी अपने तम में
आखिर किसका विश्वास करें ।
जो खुली तो तुम कुछ बोलोगे
बस काम भाव से तोलोगे ।
उसने समझा तुम्हें दोस्त, सखा
तुम बदनीयत से डोलोगे ।
वह भाव भरी तुम काम लदे
तुम नैतिक वह स्वछंदन है ।
हर घर की बहन वह बेटी हैँ
मां बनकर घर घर बैठी है ।
एक नजरिये की लिप्सा
क्यो तेरे मन पर फिर लेटी है ।
वह बोली तो तुम विचलित हो
क्यों सब चेहरों पर क्रन्दन है ।
अब भी ग्लानि से भरे नहीं
आखिर कैसे प्रतिकार करें।
मुख उसका खुला सच्चाई है
क्यों न ये जगत स्वीकार करें ।
अब भी सबूत भय दिखलाते
सच्चाई को तुम झुठलाते ।
तुम हो प्रधान निर्लज्ज समाज
फिर भी क्यों अंगीकार करें ।
फिर भी क्यों अंगीकार करें........
कुमार तनसुख
सांस भाव स्पन्दन है ।
उसकी क्या गलती तुम सोचो
उसमें देहिक आर्कषण है ।
अपना समझें आखिर किसको
किससे वह खुलकर बात करें
खिलकर सिमटी अपने तम में
आखिर किसका विश्वास करें ।
जो खुली तो तुम कुछ बोलोगे
बस काम भाव से तोलोगे ।
उसने समझा तुम्हें दोस्त, सखा
तुम बदनीयत से डोलोगे ।
वह भाव भरी तुम काम लदे
तुम नैतिक वह स्वछंदन है ।
हर घर की बहन वह बेटी हैँ
मां बनकर घर घर बैठी है ।
एक नजरिये की लिप्सा
क्यो तेरे मन पर फिर लेटी है ।
वह बोली तो तुम विचलित हो
क्यों सब चेहरों पर क्रन्दन है ।
अब भी ग्लानि से भरे नहीं
आखिर कैसे प्रतिकार करें।
मुख उसका खुला सच्चाई है
क्यों न ये जगत स्वीकार करें ।
अब भी सबूत भय दिखलाते
सच्चाई को तुम झुठलाते ।
तुम हो प्रधान निर्लज्ज समाज
फिर भी क्यों अंगीकार करें ।
फिर भी क्यों अंगीकार करें........
कुमार तनसुख

Nice
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteSuperb.....
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