कवियित्री का नाम-नलिनी बाजपेयी
शीर्षक -सहानुभूति
राज्य -छत्तीसगढ़
शीर्षक -सहानुभूति
राज्य -छत्तीसगढ़
सहानुभूति
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"तन-मन को स्वर्गिक आनन्द दे
वही होती है
सहानुभूति।
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"तन-मन को स्वर्गिक आनन्द दे
वही होती है
सहानुभूति।
अनकही वेदना से भरा ह्रदय,
प्रेम के दो बोल से नयन नीर बह उठते बेअधर,
तब सह्रदय में होती है अनुभूति।
सच यही है सच्ची
सहानुभूति।
प्रेम के दो बोल से नयन नीर बह उठते बेअधर,
तब सह्रदय में होती है अनुभूति।
सच यही है सच्ची
सहानुभूति।
क्लांत श्रान्त श्रम भूषित तन,
श्रम सिंचित मन प्यार के मीठे बोल से होती आनन्दानुभूति
सच यही है सच्ची
सहानुभूति।
श्रम सिंचित मन प्यार के मीठे बोल से होती आनन्दानुभूति
सच यही है सच्ची
सहानुभूति।
भूख से आकुल,चिथड़ों से लिपटा,
दरबदर ठोकरों में जहां
बचपन सिमटा।
देख मन कांप उठता है,
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।
दरबदर ठोकरों में जहां
बचपन सिमटा।
देख मन कांप उठता है,
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।
तारों जड़ित स्वच्छ आसमाँ,
भोर का स्वर्णिम प्रकाश
तरु झूमते,बागों का सुरभित होना देता है,
स्वप्निल आभास।
मन के कोने से झांकती,सौन्दर्यानुभूति
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।
भोर का स्वर्णिम प्रकाश
तरु झूमते,बागों का सुरभित होना देता है,
स्वप्निल आभास।
मन के कोने से झांकती,सौन्दर्यानुभूति
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।
देख प्रकृति का नर्तन,संस्कारों का अर्पण,
धरा,गगन, सूर्य,चन्द्र,में
देखा समर्पण।
पुलकित,झंकृत होती तब रहस्यानुभूति
सच तब होती है,सच्ची
सहानुभूति।
धरा,गगन, सूर्य,चन्द्र,में
देखा समर्पण।
पुलकित,झंकृत होती तब रहस्यानुभूति
सच तब होती है,सच्ची
सहानुभूति।
नेह का आंगन सूना,धैर्य पर जाल गया है बुना।
डर है सरहद पर सुहाग उसका बन जाए ना यम का पहुना।
कब बलि पथ पर चल दे जाएं ना आहुति
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।''
डर है सरहद पर सुहाग उसका बन जाए ना यम का पहुना।
कब बलि पथ पर चल दे जाएं ना आहुति
सच तब होती है सच्ची
सहानुभूति।''
• नलिनी बाजपेयी •
संबलपुर, कांकेर (छ. ग.)
संबलपुर, कांकेर (छ. ग.)

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