Monday, November 4, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री जितेश्वरी साहू सचेता की रचना- विवाह वेदी

नाम --- जितेश्वरी साहू सचेता
राज्य ------ छत्तीसगढ़
शीर्षक ---- विवाह वेदी


नव परिधानों में सुसज्जित
     विवाह-वेदी पर विराजित
कभी पलकें झुकाती
         सकुचाती किंचित्,
थोड़ा भय थोड़ी खुशी
           का मिश्रित आलम ,
अनजानी राहों पर चलने
       निज को करती तत्पर,
बीत रहे लम्हें क्षण प्रतिक्षण
       गुनती रही यही प्रतिपल ,
रिश्तें सारे पल में ही
               बदल जायेंगें ,
अजनबी कोई जिनसे
            नही कोई नातेदारी ,
घड़ी भर की ही रस्में
      मोल ले लेगी आजीवन
                     की रिश्तेदारी ,
बस सात फेरों का ये बंधन
        सात जन्मों की कहायेंगे ,
बाबुल का आँगन बीता जहाँ
             बचपन के दिन सुहाने ,
बस यादों के पन्नों
       तक ही सिमट रह जायेंगे ,
संग न होंगे सखी-सहेलियाँ
     करते न थकते थे अटखेलियाँ,
कितनी अजब दस्तुर
                      है जमाने की ,
नायाब रस्में और रिवाजें
        अपनो को भुलाने की ,
सहर्ष कर देती
           सब कुछ समर्पण ,
कितने हसीन ख्वाब
         संजो लेती मन ही मन ,
फूलों की वादियों में
            होगा एक जहां अपना ,
न सोने ,न चाँदी की
          खरा हीरे-सा होगा कोई
                             अपना ,
महल-अटारी की नही चाहत
     हो बस प्यार का छोटा सा
                                 आशियां ।
           जितेश्वरी साहू

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