नाम --- जितेश्वरी साहू सचेता
राज्य ------ छत्तीसगढ़
शीर्षक ---- विवाह वेदी
राज्य ------ छत्तीसगढ़
शीर्षक ---- विवाह वेदी
नव परिधानों में सुसज्जित
विवाह-वेदी पर विराजित
कभी पलकें झुकाती
सकुचाती किंचित्,
थोड़ा भय थोड़ी खुशी
का मिश्रित आलम ,
अनजानी राहों पर चलने
निज को करती तत्पर,
बीत रहे लम्हें क्षण प्रतिक्षण
गुनती रही यही प्रतिपल ,
रिश्तें सारे पल में ही
बदल जायेंगें ,
अजनबी कोई जिनसे
नही कोई नातेदारी ,
घड़ी भर की ही रस्में
मोल ले लेगी आजीवन
की रिश्तेदारी ,
बस सात फेरों का ये बंधन
सात जन्मों की कहायेंगे ,
बाबुल का आँगन बीता जहाँ
बचपन के दिन सुहाने ,
बस यादों के पन्नों
तक ही सिमट रह जायेंगे ,
संग न होंगे सखी-सहेलियाँ
करते न थकते थे अटखेलियाँ,
कितनी अजब दस्तुर
है जमाने की ,
नायाब रस्में और रिवाजें
अपनो को भुलाने की ,
सहर्ष कर देती
सब कुछ समर्पण ,
कितने हसीन ख्वाब
संजो लेती मन ही मन ,
फूलों की वादियों में
होगा एक जहां अपना ,
न सोने ,न चाँदी की
खरा हीरे-सा होगा कोई
अपना ,
महल-अटारी की नही चाहत
हो बस प्यार का छोटा सा
आशियां ।
विवाह-वेदी पर विराजित
कभी पलकें झुकाती
सकुचाती किंचित्,
थोड़ा भय थोड़ी खुशी
का मिश्रित आलम ,
अनजानी राहों पर चलने
निज को करती तत्पर,
बीत रहे लम्हें क्षण प्रतिक्षण
गुनती रही यही प्रतिपल ,
रिश्तें सारे पल में ही
बदल जायेंगें ,
अजनबी कोई जिनसे
नही कोई नातेदारी ,
घड़ी भर की ही रस्में
मोल ले लेगी आजीवन
की रिश्तेदारी ,
बस सात फेरों का ये बंधन
सात जन्मों की कहायेंगे ,
बाबुल का आँगन बीता जहाँ
बचपन के दिन सुहाने ,
बस यादों के पन्नों
तक ही सिमट रह जायेंगे ,
संग न होंगे सखी-सहेलियाँ
करते न थकते थे अटखेलियाँ,
कितनी अजब दस्तुर
है जमाने की ,
नायाब रस्में और रिवाजें
अपनो को भुलाने की ,
सहर्ष कर देती
सब कुछ समर्पण ,
कितने हसीन ख्वाब
संजो लेती मन ही मन ,
फूलों की वादियों में
होगा एक जहां अपना ,
न सोने ,न चाँदी की
खरा हीरे-सा होगा कोई
अपना ,
महल-अटारी की नही चाहत
हो बस प्यार का छोटा सा
आशियां ।
जितेश्वरी साहू

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