Wednesday, November 20, 2019

चंडीगढ़ से शकुन्तला जी की रचना- कर्ज़


नाम- शकुन्तला
राज्य- चंडीगढ़
शीर्षक- कर्ज़
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बड़ा भारी भरकम शब्द है कर्ज़
इसके बोझ तले इंसान डूब जाता
                                          है।
ये वो नाम है जिसे लेने से भी
आम इंसान कतराता है,
डर जाता है।।
सूदखोर महाजनों को देखो ज़रा
कैसे लूट रहे किसानों को
दे-दे कर उन्हें कर्ज़ खेती के नाम
                                      लिए
बदले में छीन लेते हैं उनकी
शांति, सुकून, चैन तीनों।
कर्ज़ में जब डूब जाता है इंसान
तो हो जाता है उसके चारों ओर
                             अँधियारा।
अंधेरे में हाथ-पांव मारता है वो
ढूंढता है गर मिल जाये उजियारा।
उजियारा मिले भी तो कैसे?
वो भी तो सूर्य का कर्ज़दार है
लेकर सूर्य से उसके किरणों का
                                        कर्ज़
रोशन कर रहा है धरा
निभा रहा है फ़र्ज़।।
माँ के दूध का कर्ज़,
पूरा करना कोई आसान तो नहीं
उम्र बीत जाती है
माँ के त्याग को समझने में ही।
कितनी राते सोई नहीं,
वो तेरी खातिर जगी हैं
रब से हर रोज़ हाथ जोड़कर
तेरे लिए ही दुआ मांगी है।
खुद गीले में रही,
तुझे सूखा रक्खा।
तेरी भूख मिटाने खातिर
कभी खुद को ही भूखा रक्खा।
क्या अदा कर सकेगा कभी इन
सब का कर्ज़???
और कैसे?????
माँ की ममता अनमोल है,
पवित्र गँगा के जैसे।
कर्ज़ का बोझा ढोते-ढोते
इंसा हो जाता बेहाल
कर्ज़ इंसा को उठने ना दे
बना दे बस कंगाल।।

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