कवियित्री - सुनीता लुल्ला
राज्य,, तेलंगाना
शीर्षक,, मन के भीतर एक जुलाहा
फोन,,
गीत
*मन के भीतर एक जुलाहा*
तरह-तरह के धागे हैं औ अनगिन ताने-बाने
क्या बुनना है, क्या तुनना है
कुछ जाने, ना जाने
मगर निरंतर लगा हुआ ये
कुछ ना कुछ तुनता है
मन के भीतर एक जुलाहा किसकी कब सुनता है?
कभी अधूरे धागे खोले मन में कुछ कुछ बोले
कभी बुनाई में लग जाये, सुख-दुख संग में तोले
सही हुआ या गलत कहीं से, मन ही मन गुनता है
मन के भीतर एक जुलाहा किसकी कब सुनता है?
कभी टाट के खुरदुर धागे बुने चदरिया जीवन की
कभी स्वयं ही खुल जाती है प्रेम चुनरिया सीवन की
किसको ओढ़े, किसे बिछाये, मुश्किल से चुनता है
मन के भीतर एक जुलाहा किसकी कब सुनता है?
बड़ा कठिन है तय कर पाना, तानों का बानों का
कभी हाथ से जो छुट जाये, टूटे संधानों का
टूटे भी तो जोड़-जोड़ कर फिर से सब तुनता है
मन के भीतर एक जुलाहा
जाने क्या बुनता है?
जो भी अब तक बुन पाया था, साथ कहाँ जाना है
मैली मन की पड़ी चदरिया, ओढ़ वही पाना है
जो मन आज कबीरा होता, मन ये ही गुनता है
मन के भीतर एक जुलाहा, आज यही बुनता है,,,
✍✍ सुनीता लुल्ला
क्या बात है । बहुत ही सुंदर रचना दी।
ReplyDelete