शीर्षक "प्राइवेट शिक्षक"
रचयिता-चंद्रभान सिंह 'अनु'
संपर्क 7062062593
राज्य - राजस्थान
रचयिता-चंद्रभान सिंह 'अनु'
संपर्क 7062062593
राज्य - राजस्थान
आज मैंने सोचा,मुझमें और मजदूर में क्या अंतर।
वो मैली कुचैली धोती पहनकर काम पर जाता।
मैं सूट बूट पहनकर काम पर जाता।
वो महीने के छः हजार रुपये पाता।
मैं भी महीने के छः हजार रुपये पाता।
वो जोहड़ खोदता ,बांध बनाता।
मैं डॉक्टर बनाता,शिक्षक बनाता।
दोनों ही सर्जन करते।
फिर भी समाज की उपेक्षा पाते।
वो कुदाली परात लेकर जाता।
मैं दो पेन डालकर जाता।
वो गरीब की उपाधि पाता।
सरकार की योजना का लाभ उडाता।
मैं तो वो अधिकार भी खो देता।
वो दो रुपये किलो गेंहू पाता।
मैं बीस रुपये किलो गेंहू पाता।
वो रात को तारों के नीचे नींद पाता।
मैं रात को बल्ब के नीचे किताबों में खोया रहता।
वो मैले कुचैले कपड़ो में सुख पाता।
मैं सूट बूट के लिए कर्ज उठाता।
वो भी जीवन का भार ढो रहा।
मैं भी जीवन का भार ढो रहा।
मुझे ,मजदूर और मुझमें में कोई अंतर नजर नहीं आता।
वो मैली कुचैली धोती पहनकर काम पर जाता।
मैं सूट बूट पहनकर काम पर जाता।
वो महीने के छः हजार रुपये पाता।
मैं भी महीने के छः हजार रुपये पाता।
वो जोहड़ खोदता ,बांध बनाता।
मैं डॉक्टर बनाता,शिक्षक बनाता।
दोनों ही सर्जन करते।
फिर भी समाज की उपेक्षा पाते।
वो कुदाली परात लेकर जाता।
मैं दो पेन डालकर जाता।
वो गरीब की उपाधि पाता।
सरकार की योजना का लाभ उडाता।
मैं तो वो अधिकार भी खो देता।
वो दो रुपये किलो गेंहू पाता।
मैं बीस रुपये किलो गेंहू पाता।
वो रात को तारों के नीचे नींद पाता।
मैं रात को बल्ब के नीचे किताबों में खोया रहता।
वो मैले कुचैले कपड़ो में सुख पाता।
मैं सूट बूट के लिए कर्ज उठाता।
वो भी जीवन का भार ढो रहा।
मैं भी जीवन का भार ढो रहा।
मुझे ,मजदूर और मुझमें में कोई अंतर नजर नहीं आता।

कड़वी सच्चाई।
ReplyDeleteउच्च विचारों को उजागर करने वाली एक अद्वितीय लेख
ReplyDeleteNice h sir Ji meri kavita
ReplyDeleteयथार्थ है आपकी कविता मैं गुरु जी
ReplyDeleteनिजी क्षेत्र के कर्मचारी की पीड़ा को बताती एक सुंदर कविता ।
ReplyDeleteकाम करते ज्यादा दाम न पाते आधा।
निजी क्षेत्र के कर्मचारी की पीड़ा को बताती एक सुंदर कविता ।
ReplyDeleteकाम करते ज्यादा दाम न पाते आधा।
वास्तविक यथार्थ प्रकट करती लेखनी
ReplyDeleteशिक्षा के संदर्भ में शिक्षा की दुर्दशा ,,, का क्या चित्रांकन किया है !!!
Deleteअद्भुत,,,
व्यंग्य है शिक्षा व्यवस्था पर और करारी चोट जो की एक शिक्षक की लेखनी से निकली है,,,
हमें मज़दूर से भी सहानुभूति है ,,,
थैंक्स सर
Deleteसर आपने
Deleteव्यक्ति की आंतरिक पीडा व मन के द्वंद्व को व कडवी सच्चाई को शब्दों में बखूबी समाज के सामने प्रस्तुत किया है
में तो वो अधिकार भी को देता।।
ReplyDeleteक्या बात h बन्नाजी शब्दों का ऐसा सामंजस्य व गूढ़ अर्थ 👌👌 रघुवीर सहाय ,नागार्जुन ,बच्चन सभी का अक्ष नजर आता है आपनेआ ।दिल से सलाम।
थैंक्स सर
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