Monday, October 14, 2019

छ. ग. से कवि शैलेन्द्र चेलक की रचना- मेरा घर मकान लगने लगा है


नाम - शैलेन्द्र चेलक
शीर्षक - मेरा घर मकान लगने लगा है
सम्पर्क -9098518976
पता - पेंडरवानी ,बालोद ,छ. ग. ।


मेरा घर मकान लगने लगा है

जिंदगी अब बेजान लगने लगा है ,
रिश्तों में तूफ़ान लगने लगा है ,
किसे , क्यूँ सम्हाले रहूं कब तक ?
जीने से मरना आसान लगने लगा है ,
क्यूं सिमटती जा रही है अपनों की जिंदगी ,
हर कोई खुद में महान लगने लगा है ,
फिज़ा में भी खिज़ा सा माहौल है हर पल ,
अपनो की महफ़िल में अंजान लगने लगा है ,
नियत से नीयति बदलता है सुना था ,
नियतों से ही परेशान लगने लगा है ,
रहकर भी इंसानों के समंदर में अकेला है आदमी ,
गुफ़्तगू की दम मौज़ूदगी में ,वीरान लगने लगा है ,
दरख्तों से सज़ा घर मेरा अब मकां लगने लगा है ,
अब भी रहते हैं लोग यहां ,पर जिंदो का शमशान लगने लगा है ,
मेरा घर मकान .......
               - शैलेन्द्र चेलक -

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