कवि:- संजय वासनिक
शीर्षक:-ईंतेजार
पता:- चेंबुर , मुंबई, महाराष्ट्र
भ्रमणध्वणी :- ९८६९०८१४८४.
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ईंतेजार
चरमराहट की आवाज
टुटीसी खटिया की
झोपडीनुमा घर से
पुरानी खटियापर
पुराना अकेला इंसान ...
वह बुढा....
टिमटीमाते दिये की
बिमारसी रोशनी मे
पडे़ पड़े सोने की
कोशिश करता था ...
बिमार सा
लगनेवाला अकेला शख्श...
वह बुढा....
आसमां की ओर एकटक
घर की छत के झरोखेसे
बिती बातों को याद करता
अकेला रहता था
वह बुढा ...
पुरानी यादों को
आंखे कहे जानेवाले
शुन्य भावहीन
बंदसे खड्डोसे,
शुन्यमे निहारता
अकेला रहता था..
वह बुढा ....
वह बुढी काया अपनी
बेकाबु खासीं को
असफल नियंत्रित
करने की नाकामयाब
कोशिश करता
अकेला रहता था..
वह बुढा...
जब उससे बिछडे हुये
अपनो की यादें
शायद बहुत
सताती थी
तब न जाने क्युं
बेकार मे रोता था
अकेले अकेले
वह बुढ़ा .....
कभी लौटकर ना
आनेवालो की
राह तकता रहता था ...
अकेले अकेले अकेला
वह बुढा....
# संजय वासनिक
एक अवश्यंभावी कटु सत्य जो सभी के जीवन की कथा है या होने वाला है।
ReplyDeleteMastch sir
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteManushya ke Jivan ka ek katu Satya.
ReplyDeleteबहोत खूब
ReplyDeleteBehatarin rachana
ReplyDeleteबहुत खूब सर जी। सही लिखा है आपने जो कभी आने वाले ही नहीं है बाट जोहते जोहते पूरी जिंदगी गुजार देते है बुजुर्ग जन्मदाता
ReplyDeleteExcellent, Reality of Life
ReplyDeleteVery beautifully penned facts and realistic moments in ones life.
ReplyDeleteVery nice written. Real fact.
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