Thursday, October 17, 2019

असम से कवयित्री डॉ सुनीता अग्रवाल:सौम्या की रचना- मैं मामूली रचनाकारा!



नाम - डॉ सुनीता अग्रवाल:सौम्या
राज्य - असम
शीर्षक - मैं मामूली रचनाकारा!
विधा - गीत।
गीत
*मैं मामूली रचनाकारा*
आसमान के तुम हो तारा!
मैं मामूली रचनाकारा!!
प्रेम बीज जब हो बरसाते।
सच कह दूँ तुम खूब लुभाते।।
लेकिन तुमने जग ललकारा,
मैं मामूली रचनाकारा!!
ऊँच नीच की भींत बड़ी है।
बीच हमारे भीड़ खड़ी है।
लड़ पाओगे क्या तुम यारा?
मैं मामूली रचनाकारा!!
शब्द शब्द में उलझ सुलझ कर।
संग संग भावों में बह कर।
कब बन बैठे उभय सहारा,
मैं मामूली रचनाकारा!!
न्याय,प्यार क्यों दोनों  अंधे?
मौलिक हक को कहते धंधे?
इनके बिन हों नहीं गुजारा,
मैं मामूली रचनाकारा!!
*आसमान के तुम हो तारा!*
*मैं मामूली रचनाकारा!!*
डॉ सुनीता अग्रवाल:सौम्या
दन्त-चिकित्सक।
मो.9435727659

3 comments:

  1. very very nice.बहुत ही सुन्दर और मनोरम तथा बोधगम्य कविता है।

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  2. भावपूर्ण रचना!!

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