रचनाकार - गजेंद्र द्विवेदी गिरीश
राज्य - छत्तीसगढ़ (भिलाई 3)
संपर्क - 7000858588
शीर्षक - अब तो मान जा।।
अब तो मान जा मन मेरे।
बहुत दूर नहीं है सवेरा,
छंट जाएगा जल्द ही अँधेरा,
रवि की पहली किरण संग,
चमकने लगेगा बसेरा।1।
छंट जाएगा जल्द ही अँधेरा,
रवि की पहली किरण संग,
चमकने लगेगा बसेरा।1।
होगी फिर नयी शुरुआत,
दिलों पर ना होगा आघात,
मुस्कान की होगी बारिश हरकहीं,
मिलेगी खुशियों की सौगात।2।
दिलों पर ना होगा आघात,
मुस्कान की होगी बारिश हरकहीं,
मिलेगी खुशियों की सौगात।2।
तुमसे होंगी बाते मेरी,
मैं सुनूँगा अनकही तेरी,
अब न रहेगा सन्नाटा दरमियाँ,
मिट जाएँगी दिलों की दुरी।3।
मैं सुनूँगा अनकही तेरी,
अब न रहेगा सन्नाटा दरमियाँ,
मिट जाएँगी दिलों की दुरी।3।
खुल जाएंगे सबके भाग्य
आएगा फिर रामराज्य,
हर दिन होगी जैसे है दीवाली,
खुशहाली वाले होंगे नाट्य।4।
आएगा फिर रामराज्य,
हर दिन होगी जैसे है दीवाली,
खुशहाली वाले होंगे नाट्य।4।
मिट जाएगा मन से विद्वेष,
धरेगा ना कोई शैतानी वेश,
स्नेह आदर की बहेगी सरिता निर्झर,
बनेगा विश्व गुरु हमारा देश।5।
धरेगा ना कोई शैतानी वेश,
स्नेह आदर की बहेगी सरिता निर्झर,
बनेगा विश्व गुरु हमारा देश।5।
अब तो मान जा मन मेरे।।
(c) गजेन्द्र द्विवेदी गिरीश

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