कवि- सुधांशु श्रीवास्तव "जीत"
मोबाइल- 9691147957
राज्य- छत्तीसगढ़
शीर्षक- गुनाह करना है
*गुनाह करना है*
अब मुझे खुद की आज़माइश सरे राह करना है।
इल्ज़ामात सब लग गए हैं, अब गुनाह करना है।।
फितरत नहीं थी मेरी दिखावे की या वाकिफ़ नहीं था।
दर्द हो ज़ख्म हो या ना हो यहाँ तो बस आह करना है।।
रात शिद्दत से मुकाबला कर रही है मेरे दिल के अंधेरों से।
अब खुदा को भी लग रहा कि रात और स्याह करना है।।
बस चाह और चाहत का फ़र्क है कि उसे जाने दिया।
आज भी हासिल करना चाहें तो बस चाह करना है।।
आगे बढ़ना शुरू किया तो लोग बिछा रहे इतने पत्थर।
मैं तो हूँ ही कारीगर, इसे पाटकर बस राह करना है।।
इतने सारे दुनियादारी के झमेलों में बहुत काम है मुझे।
पर मेरा पसंदीदा काम तो बस तेरी परवाह करना है।।
इन परिंदों को देखो आसमान छूकर आये हैं फिर भी।
ये वाकिफ़ हैं कि इन्हें ज़मीन पर पनाह करना है।।
ज़रा सोचिए कितने दर्द में लिखी होंगी शायरी मैंने।
पर आपको क्या है, आपको तो बस वाह करना है।।
सुधांशु श्रीवास्तव "जीत"
Nice
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना,सटीक अल्फाज का प्रयोग किए है
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