शीर्षक- नीलकंठ
कवयित्री- नीता झा
स्थान- छत्तीसगढ़
नीलगगन नीलकंठ का भान कराता
अपने अंदर रखता अब विष का प्याला
वर्षा भी अब होती नहीं है एक सरीखी
कहीं है सुखी कहीं ज़लज़ले सी जिद्दी
पानी बरसे बे हिसाब घर बहता है
सभी हैं बेघर बीमारी से जीवन रोता है
कहीं है सूखा इतना के दम घुटता है
पीने का पानी भी अब गोले में बिकता है
नील गगन नीलकंठ का भान कराता
अपने अंदर रखता अब विष का प्याला
महाप्रलय आने की दस्तक हो गई है
लोगों की मनमानी खुदपर भारी हो गई है
जीवनदायी नदियां सुख रही है
निले निष्छल सागर बन्धन तोड़ चले
शहरों, गाओं को डुबो रहे हैं
जीवन थर थर कांप रहा मन रोता है
आने वाली नस्लें की चिंता किसको है
हरकोई जहर फैला भी पाक साफ बन्दा हैं
निलगगन नीलकंठ का भान कराता
अपने अंदर रखता अब विष का प्याला
नीता झा
मौलिक स्वरचित रचना
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