कवि -अनिलशुक्ल
शीर्षक- हरितालिका
सम्पर्क-7828501850
स्थान-बस्तर जगदलपुर
कितना अपनत्व है मुझसे जब तुम मुझ पर इतना विश्वास करती हो।
मेरे दीर्घायु होने के लिये निर्जल उपवास करती हो।
सच हमारी संस्कृति है
महान।
तब तो दिन भर से कामकाज
कर नही किया जलपान।
कितना धैर्य कितनी सहनशीलता कितना त्याग
मुँह में दिनभर में पानी का एक घूंट भी नहीँ ईश्वर में माँगती रहे अखण्ड सुहाग।
मुख हो रहा मलीन शरीर हो
रहा कमजोर।
पर पूजा हेतु तैयारी चल रहा है पुरजोर।
सज संवर कर हो रहीं सुन्दर
जहीन।
थकावट भाग गया है उत्साह
से पूरा वातावरण हो रहा है
सराबोर।
महादेव पार्वती के जयकारे का बढ़ता शोर।
पित भड़क उठा है शरीर चकरा रहा।
अभी अभी तो उन्होंने हरितालिका के व्रत की कथा
को जोर जोर कहा।
प्यास के मारे कण्ठ सूखता जा रहा है।
पूजन में उन्हें पुरजोर आनन्द
आ रहा है।
इतनी सहनशीलता औऱ धैर्य
ये कहां से लाती हैं।
तभी तो हिंदुस्तान की नारियां
देवी कहलाती हैं।
सफल हो पूजन हरितालिका
सदा सहाय हो महादेव एवम
मात कालिका ।
कह अनिलशुक्ल जय हो
जय हो हे नारी धरती पर तु
है अवतारी।
कवि अनिलशुक्ल
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