Monday, September 30, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री जितेश्वरी साहू सचेता की रचना- हे महिषासुर मर्दिनी

कवियत्री ----- जितेश्वरी साहू सचेता
शीर्षक ------" हे महिषासुर मर्दिनी"
राज्य ------- छत्तीसगढ़
कविता ------

हे महिषासुर मर्दिनी !
आज फिर धरा पर आना होगा ,
नारी के मान , नारी की गरिमा का
वसन फिर बचाना होगा ,
छिपे बैठे है असुर कितने
मच्छरों सदृश मौकापरस्त कितने ,
ढूंढ-ढूंढ कर उन दुश्शासनों को
मिट्टी में मिलाना होगा ,
हे महिषासुर मर्दिनी !
आज फिर ............
हे नारी ! समय नही अब रोने का
इतिहास गवाह है और नही अब खोने का,
बेशक स्नेह - त्याग की प्रतिमूर्ति तुम
वक्त पड़े तो रूप विकराल धरती तुम ,
हे मां कालिके ! हे मां चंडिके !
हे मां शारदे ! हे मां भद्रिके !
आओ माते कर के सिंह की सवारी
हे आदिशक्ति ! रग-रग बसों , पड़ूं दुर्जनों पे भारी ,
वजुद निज का पहचानों हे जननी !
निज आन की लड़ाई तुमको ही लड़नी ,
संभल जाओ रे तुच्छ पशुता के बंदे ,
निश्चित ही अब दूर नही तेरे काल के फंदे,
एक-एक नारी अब अवतार धरेगी
चुन-चुन कर असुर धड़ अलग  करेगी,
तेरी आसुरी दुनिया में तब हाहाकार  मच जायेगा
भाल तेरा जब तुझको ही चढ़ाया जायेगा ,
तुम साथ हो न , हे  मां भवानी !
गिन-गिन कर सबक सिखाना होगा ,
जिन निकृष्टों ने  मां - भगिनी का अपमान किया
उन दृष्टि पतितों को भस्मिभूत कराना होगा ,
हे महिषासुर मर्दिनी !
आज फिर धरा पर आना होगा ।

जितेश्वरी साहू सचेता

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