नाम : ओम प्रकाश फुलारा "प्रफुल्ल"
कविता : संसार
राज्य: उत्तराखंड
संपर्क न. : 9411583567
पग पग मिले यहाँ, दुःख और प्यार है
गजब निराला देखो, यह संसार है।
अपने पराये यहाँ, कब बन जाएँ देखो,
गैरों से ही सदा यहाँ, मिलता ये प्यार है।
खुशी में भी जले यहाँ, दुःख में किनारा करे,
अपनों की प्रीत देखो, दोधारी तलवार है।
बढ़े यहाँ जो भी देखो, होती खींचतान है,
सत्य पर चले जो भी, मिले उसे मार है।
दीन के घर कभी, जले नही चूल्हा यहाँ,
सम्पन्न लोगों के यहाँ, सदा ही बहार है।
ऊँच नीच की ये खाई, बाँटे नित प्यार को,
भाई और भाई बीच, देखो मारा मार है।
नियम बहुत यहाँ, दण्ड का विधान है,
अबला पे फिर भी , होता अत्याचार है।
मुखौटे पहनकर, घूमे नित लोग यहाँ,
मुखौटे के पीछे देखो, काला ये बाजार है।
अपने पराये यहाँ, आते न पहचान में
भूलभुलैया बना, देखो ये संसार है।
ओम प्रकाश फुलारा "प्रफुल्ल"
दीन के घर कभी, जले नही चूल्हा यहाँ,
ReplyDeleteसम्पन्न लोगों के यहाँ, सदा ही बहार है।
बहुत सुंदर रचना प्रफ़ुल्ल...
प्रत्येक शब्द ,,,प्रत्येक पंक्ति सुंदर रूप से संयोजित,,,भावपूर्ण एवं अर्थपूर्ण रचना....
अति सुन्दर।समाज का मार्मिक चित्रण
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना...
ReplyDeleteबहुत सुंदर कृति
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteखूबसूरत रचना
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
Bahut hi
ReplyDeletebadeya
Very nice
ReplyDeleteBahut accha
ReplyDeleteसुंदर और सार्थक कविता
ReplyDeletelajwaab, ati sundr
ReplyDeletelajwaab, ati sundr
ReplyDeletelajwaab, ati sundr
ReplyDeleteBahut hi sundar rachna
ReplyDeleteसुंदर रचना
ReplyDeleteबेहतरीन रचना
ReplyDeleteNice poem
ReplyDeleteजी प्रकाश जी
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