कवि-राजकुमार पाण्डेय
शीर्षक-सिंगार कर लो
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राज्य-छ ग
सिंगार कर लो
अभिसार के दिन हैं तुम्हारे
सिंगार कर लो,
नयन तीखे बाण जैसे
वार कर लो।
बीत न जायें ये घडियाँ
पल दो पथकर,
जी में जो आये
मधुर व्यवहार कर लो।
सूर्य हो जैसे कि
ये तन जल रहा है,
और जैसे मोम हो
मन गल रहा है,
चाहते जो रोकना
इस ताप को,
अपने हिय से
स्नेह शीतल धार कर दो।
एक मरूथल, एक जंगल
एक बंजर
थे चुभाये इस हृदय में
लाख खंजर,
एक सूनापन खटकता ही
रहा है
पायलों की तुम
मधुर झंकार भर दो।
पास मेरे काम तो
कमनीय हो तुम,
विश्व में सबसे अधिक
रमणीय हो तुम।
मेरी सारी भावनाएँ
साथ तेरे
ये सुमन तुम
हर्ष से स्वीकार कर लो।
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राजकुमार पाण्डेय
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