Friday, September 20, 2019

छत्तीसगढ़ से कवि शंभु कश्यप (दादा) की रचना- मेरा सुकमा

कवि - शंभु कश्यप (दादा)
शीर्षक - मेरा सुकमा
पता - सुकमा
राज्य - छत्तीसगढ़

सुकमा की सैर पर चलो मेरे संग
दण्डकारण्य भुमि का रहा अंग
चारों ओर घने वन, बहुत थे जानवर जंगली
सरल स्वभावी जंगलो के राजा थे भोले आदिवासी
जल-जंगल-जमीन सब आदिवासियों का था अपना
इनके अलावा न उनका कुछ था सपना
फिर आई रियासती काल
बारहवीं सदी का था साल
सुकमा चिंतलनार कोत्तागुड़म रेकापल्ली सारी
भीजी (भेज्जी) राज्य की थी जमींदारी
आज भी मिलेंगी खंडहर प्राचीन
फिर सुकमा आई बस्तर राज्य के अधीन
सुकमा जमींदारी बहुत पुरानी
इनकी भी रही बड़ी कहानी
जन्मभुमि थी इनकी वारंगल
आये थे पार कर नदी जंगल
कहा जाता बीच नदी में नाव था ठहरा
एक बालक की मांग कर रहा
बालक शबरी को कुर्बान
बचानी थी अन्यो की जान
मुनीपुत्ता तेलावर्ती था वो स्थान
शिवलिंग की टापू वो भोलेनाथ का धाम
नदी पार कर दंपति ने घर बनाया जगह डोंगरी
शिवलिंग स्थापित किये कहलाया महादेव डोंगरी
उस तरफ थे काफी जंगली जानवर
उन्होने फिर शबरी तट पर बनाया घर
उनको सुख मिला मन उनका रमा
वह सुख स्थल कहलाया सुकमा
इनकी आराध्य है चिटमिटीन माता
आज भी पुजारी पुजन में वारंगल की माई गाता
सुकमा जमींदारी के रामराज थे संस्थापक
बस्तर राज्य अधीन अंग्रेजी हुकुमत
रामराज ने उन्नीस सौ तीन में महल बनाया
इस घराने की रही विशेषता
रंगाराज नाम जिसका उसका पुत्र रामराज कहलाता
जमींदार कन्या का विवाह बस्तर नरेश से मना
दहेज में दिया कुकानार परगना
उन्नीस सौ आंठ में सुकमा- जगदलपुर सड़क बना
तब सुकमा में था एक शाला, एक थाना
सुकमा जमींदारी मे थे सवा सौ गांव
चलती थी तब बैलगाड़ी और नांव
आजादी की लड़ाई बस्तर क्रांति भुमकाल
कोण्टा से धनीराम, सुकमा से बोड़की-बोरी और दनिया ने उठाया भाल
गुण्डाधुर के संग बने अंग्रेजों के काल
सवा उन्नीसवी में भयावह बाढ थी आई
रामायण की शबरी से नदी  कहलाई
आजादी के बाद सुकमा जमींदारी बस्तर जिला में गया मिल
अंठानब्बे में दन्तेवाड़ा जिला में गया मिल
कोण्टा थी तहसील
फिर दो हजार बारह में बना सुकमा जिला
भारत की बगिया में जैसे एक फूल खिला
जो विकास की राह पर चल निकला
बढ़ता सुकमा, पढ़ता सुकमा
सुंदर सुकमा, बदलता सुकमा।।

शंभु कश्यप (दादा)
9406377737

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