कवि बजरंग दान चारण
राज्य राजस्थान
मोबाइल न 8949410152
विधा कविता
शीर्षक ममता की अवतार
ममता की अवतार
खुद की परेशानी में कभी शिकन नही लाती
मगर औलाद की उदासी में मां कुम्हला जाती है
कुर्बान जिंदगी कर देती बच्चों को पढ़ाने में क्यों औलाद तरस न खाती वृद्धाश्रम लेजाने में
एक आंसू भी औलाद का जो देख नहीं पाती वही औलाद क्यों पत्थर दिल बन जाती है
हर तकलीफ सह जाती ,मां मंजिल दिलाने में क्यों बेटे की रूह न कांपी, मां को तड़पाने में
ज़रा सी उदासी बेटे की जो देख नहीं पाती
सब कुछ लुटा कर भी मां नहीं जताती है कांटो की डगर में भी जो फूल बिछाती है
एक मां ही है जो हमें जीना सिखाती है
बड़े से बड़े जख्म को भी मां सह जाती है क्योंकि जान से बढ़कर औलाद को चाहती है हर खुशी लुटा कर अपनी बच्चों को पढ़ाती है
वह मां घुट घुट घर में अकेली क्यों मर जाती है
दिल के दीपक को रोशन करने माँ बाती बन जाती है
कितनी त्याग तपस्या से जो पूत प्रोफेसर बनाती है
उस बेटे को बूढ़ी मां इतनी बोझ क्यों लग जाती है
वह मां बेटे के हाथों बंगले से फेंक दी जाती है
बेटे की संवेदना, जब मर गई उस पार
जी करके क्या करती मां, मर गई इस बार
पश्चिम कैसे खा गया भारत के संस्कार कंकाल पिंजर बन गई करुणा की की करुणा
तमाम उम्र करती रही मां अनंत उपकार आखिर में औलाद ने दिया महल से धक्का मार
रूह क्यों कांपी नही जब सुना मां का बेहाल
बेटे के रुक्ष व्यवहार से मां बनी कंकाल
वर्षों बरस बरस कर जब तरस गई इस बार अकेलेपन ने तोड़ दी आज धीरज की ढाल
बेटे के व्यवहार से मां डर गई बेशुमार
बेटा बेटा पुकारते मर गई ममता की अवतार।
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