नाम ------ जितेश्वरी साहू सचेता
शीर्षक----- "सदियों तलक "
सम्पर्क नं. -----
राज्य ------- छत्तीसगढ़
कविता ------
शीर्षक----- "सदियों तलक "
सम्पर्क नं. -----
राज्य ------- छत्तीसगढ़
कविता ------
ओ तारें ! कितने पास
तुम आज लग रहे,
हाथ बढ़ा के यूं छु लुं
इतने पास लग रहे ,
स्त्री या पुरुष होने के
दायरे से बाहर,
कर सकती हूं बातें
होकर बेझिझक,
ये सही होगा न कहना
या ये होगा गलत,
नही देना पड़ेगा जोर
अपने दिमाग पर,
छत पर खड़ी हूं मैं
उतर आओ तुम भी ,
होंगी बातें ढेर -सी
कुछ मैं कहुं
कुछ तुम भी ,
ओ गगन के
तारें प्यारें !
नाता तेरा -मेरा
बड़ा पाक-निश्छल,
लगा नही सकते कोई
ऐसा वैसा कलंक ,
खोल के रख दूं
निज अंतर्मन के पट,
तु बस आ के
पढ़ लेना झट ,
इंसानों के दायरें
से परें ,
देने-लेने के
झमेलें से आगे,
निर्मलता को
भर - भर आगोश,
करते रहे यूं ही
अनगिन मुलाकातें ,
जानती हूं ! मैं रहूं
या न रहूं
तुम यूं ही मिलोगे
सदियों सदियों तलक ।
तुम आज लग रहे,
हाथ बढ़ा के यूं छु लुं
इतने पास लग रहे ,
स्त्री या पुरुष होने के
दायरे से बाहर,
कर सकती हूं बातें
होकर बेझिझक,
ये सही होगा न कहना
या ये होगा गलत,
नही देना पड़ेगा जोर
अपने दिमाग पर,
छत पर खड़ी हूं मैं
उतर आओ तुम भी ,
होंगी बातें ढेर -सी
कुछ मैं कहुं
कुछ तुम भी ,
ओ गगन के
तारें प्यारें !
नाता तेरा -मेरा
बड़ा पाक-निश्छल,
लगा नही सकते कोई
ऐसा वैसा कलंक ,
खोल के रख दूं
निज अंतर्मन के पट,
तु बस आ के
पढ़ लेना झट ,
इंसानों के दायरें
से परें ,
देने-लेने के
झमेलें से आगे,
निर्मलता को
भर - भर आगोश,
करते रहे यूं ही
अनगिन मुलाकातें ,
जानती हूं ! मैं रहूं
या न रहूं
तुम यूं ही मिलोगे
सदियों सदियों तलक ।
जितेश्वरी साहू सचेता
Badhiya 👌👌
ReplyDeleteधन्यवाद जी
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