Monday, September 23, 2019

छत्तीसगढ़ से कवयित्री जितेश्वरी साहू सचेता की रचना- सदियों तलक

नाम ------ जितेश्वरी साहू सचेता
शीर्षक----- "सदियों तलक "
सम्पर्क नं. -----
राज्य  ------- छत्तीसगढ़
कविता ------
ओ तारें ! कितने पास
       तुम आज  लग रहे,
हाथ बढ़ा के यूं छु लुं
      इतने पास लग रहे ,
स्त्री या पुरुष होने के
        दायरे से बाहर,
कर सकती हूं बातें
   होकर बेझिझक,
ये सही होगा न कहना
  या ये होगा गलत,
नही देना पड़ेगा जोर
    अपने दिमाग पर,
छत पर खड़ी हूं मैं
   उतर आओ तुम भी ,
होंगी बातें ढेर -सी
     कुछ मैं कहुं
        कुछ तुम भी ,
ओ गगन के
           तारें प्यारें !
नाता तेरा -मेरा
     बड़ा पाक-निश्छल,
लगा नही सकते कोई
   ऐसा वैसा कलंक ,
खोल के रख दूं
निज अंतर्मन के पट,
तु बस आ के
     पढ़ लेना झट ,
इंसानों के दायरें
                 से परें ,
देने-लेने के
            झमेलें से आगे,
निर्मलता को
    भर - भर आगोश,
करते रहे यूं ही
     अनगिन मुलाकातें ,
जानती हूं ! मैं रहूं
            या न रहूं
    तुम यूं ही मिलोगे
          सदियों सदियों तलक ।
   जितेश्वरी साहू सचेता

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