कवि-राजकुमार पाण्डेय
रचना -उग ही आया सूरज
राज्य -छत्तीसगढ़
संपर्क 9691442209
*उग ही आया सूरज *
अंधेरे के सरदारों ने
जीभर कर किया षडयंत्र,
उजाले के विरूद्घ।
ऊंची ऊँची दीवारें
उठा दिन,
ताकि आ न सके सूरज,
और अंधेरा बना रहे।
शान से चलती रहे,
भरमाने की दूकान।
लगाते रहे,
झिलमिल झिलमिल करते
परदे और शामियाने कि,
सूरज निकले भी तो
परावर्तित हो जायें किरणें।
नीम अँधेरे को उजाला कहें
दौर ये चलता रहे।
यहाँ शगूफा, वहाँ अफवाह के
बोते रहे बीज कि, सूरज के तेवर,
बडे कडे हैं,
सूरज की किरणों में
ताप ही नहीं ए यू रेज़
होती हैं, उजाले के साथ।
सूरज तो सूरज ही होता है।
सबसे अलग, सबसे ऊपर
होता है, सूरज का रास्ता।
आखिर, सभी षडयंत्रों के बाद भी-
उग आया सूरज।
अँधेरा सिमट गया
नेपथ्य में।
अंधेरों के सरदार
छिप गये हैं,
अँधेरेकी ओट में।
अब भी वे करते रहते हैं,
कानाफूसी कि
सूरज तप रहा है,
त्रस्त हैं, लोग यहाँ,
तानाशाह बन गया है सूरज।
राजकुमार पाण्डेय
चारामा कांकेर छ ग
9691442209
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