नाम- डॉ अलका कुमारी
राज्य- झारखंड ( रांची)
शीर्षक- स्त्री की वेदना
संपर्क-
स्त्री की वेदना
क्या कहूँ!
कासे कहूँ!
अस्तित्व की इस लड़ाई मे
संस्काररूपी नौका मे सवार,
खुद को कहीं दूर छोड़ आई।
एक बेजुबान सी परछाई,
खुद को तरास रही।
अपनी पहचान को दूसरे से,
आस रही।
संघर्ष नाम दिया,
सिखाया उसे त्याग,
खुद के लिए दी आवाज
तो हुआ परित्याग।
उसे सिखाया कभी मीरा,
तो कभी सीता का पाठ।
आज इस मानस पटल पर
उभरी एक आवाज।
ये एक प्रसंचिह्न है ,
या कोई विराम?
आधुनिकता के इस दौर मे,
स्त्री की वेदना से है अंजान?
युं तो ईश्वर की उत्कृष्ठ रचना
धरा पर स्त्री का आना।
खुबसुरती, कोमलता, सहिस्णुता
सुसज्जित है इन अलंकारों से
पर इस जग ने
इन अलंकारों को किया घृणित।
जब तक सहे
बिना कुछ कहे,
कहलाये लक्ष्मी एवम् गुणवान
जब खुद की कहे,
तो नवाजे जाते
असभ्य, अभद्र
ना जाने कितने उपनाम।
अमूल्य हो कर भी
लगती इसकी मोल,
रीति- रिवाज, परम्परा,
नामक बेड़ियाँ क्या उसे
बनाती अनमोल?
उसकी पवित्रता की मानकता है तैयार
कभी अग्नि परीक्षा, या कोई
घातक प्रहार।
दोषी चाहे कोई भी हो
पर आँच हमेशा,
उसी पर आई।
एक सवाल जो जहन मे आई
औरत तेरी पहचान बस ये?
साज-सज्जा का समान बस ये?
इशारों की चकरी ने घुमाया।
लोगों ने झूठी परम्परा मे फसाया।
हर पल त्याग और बलिदान।
पुत्री, बहन, सखा
अर्धांगिनी या फिर माँ
हर स्वरूप से चाहा त्याग।
एक दायरे के अंदर ही
बना दिया आजाद।
अपने अतित्व के लिए
गर्भ से ही लड़ती आई।
अपनी वेदनाओं को
चंद आँशुओ तले छिपाई।
भूख नही इसे दौलत की
चाह है बस,
इज्जत प्यार और सम्मान की।
✍ डॉ अलका कुमारी✍
बहुत ही अच्छा और लोकप्रिय
ReplyDeleteबहुत ही अच्छा और लोकप्रिय
ReplyDeleteवाह अलका जी
ReplyDeleteBahut badhiya
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