Monday, September 16, 2019

जगदलपुर छतीसगढ़ से कवि अनिलशुक्ल की रचना- चीखे क्रन्दन क्यों है

कवि-अनिलशुक्ल
शीर्षक-चीखे क्रन्दन क्यों है
सम्पर्क-7828501850
स्थान-जगदलपुर छतीसगढ़

सहमा सहमा सा ये बचपन
न जाने किसका ख़ौफ है।
न किसी से अदावत न किसी
से अनबन
फ़िर क्यों थर्राया रहता है ये
मेरा बस्तर अरण्य
ये बस्तर का बचपन
यहाँ महकते साल टोरा
कहलाता धान का कटोरा
धान के कटोरे से ये कैसा झरन है।
सहमा सहमा सा गुमशुम
क्यों यहाँ का बचपन है
रुक रुक कर सघन बियाबान
वन क्यो थर्राता है
इसका विध्वंस से क्या नाता है।
जंगलो से क्यो शहर की ओर
अब पेट के खातिर क्यों गमन
है।
ये तो भोले भाले लोगों का घर है यहाँ अमृत पिला उतारा
जाता जहर है।
फिर क्यों इस शान्ति के दीप
में आती आवाजे धांय धांय
ठनन ठनन है।
यहाँ तीखुर चार चिरोंजी हवा
में घुलता मादक पेय लन्दा शल्फी है।
फिर क्यों कर घुल जाता लाल
लाल रंग जिससे मानवता में होता क्रंदन है
नजर सा लग गया इस शान्ति
के टापू को
अब तो होता भी कम आवागमन है।
पहाड़ी मैना के सुर में आज
चीखें क्रन्दन क्यों है।
सब समस्या सुलटे इंद्रावती
कुलांचे मार चित्र कूट प्रपात
पर सघन जल उलटे
खिलखिला हो बचपन
कह अनिलशुक्ल
खुला खुला हो वन वह अबाध
रूप से चले आवागमन ऐसा
हो मां दंतेश्वरी मेरा बस्तर
मेरा अरण्य ।

कवि अनिलशुक्ल

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