नाम- माधवी गणवीर
शीर्षक- रूठी प्रकृति
राज्य- छत्तीसगढ़
सम्पर्क-
शीर्षक- रूठी प्रकृति
राज्य- छत्तीसगढ़
सम्पर्क-
रुठी प्रकृति
शहर हो,नगर हो,या हो गाँव
चाहे कही भी डालो तुम पाँव
जन-जन में बढ़ रही रफ़्तार है
चारो ओर मचा हाहाकार है।
चाहे कही भी डालो तुम पाँव
जन-जन में बढ़ रही रफ़्तार है
चारो ओर मचा हाहाकार है।
फैला आतंक,आक्रोश, भष्ट्राचार भाई
और सर चढ़ के बोले मंहगाई
दूर-दूर तक न ठौर न छांव
अब नही है कौवे की काव
प्रकृति से हम वैसे ही बिछड़े
परदेश जाकर लाल, मां से बिछड़े
प्रत्येक जन की तकलीफ है आज
कौन भुगतेगा इसका अंजाम
बस्ती ही बस्ती न जंगल, न बांस,
अब तो छुट गई हमारी आस
आदमी ही खा रहा है आदमी का मांस,
और सर चढ़ के बोले मंहगाई
दूर-दूर तक न ठौर न छांव
अब नही है कौवे की काव
प्रकृति से हम वैसे ही बिछड़े
परदेश जाकर लाल, मां से बिछड़े
प्रत्येक जन की तकलीफ है आज
कौन भुगतेगा इसका अंजाम
बस्ती ही बस्ती न जंगल, न बांस,
अब तो छुट गई हमारी आस
आदमी ही खा रहा है आदमी का मांस,
कैसी आपदा कैसी बेरुखी
अब तो प्रकृति भी थक चुकी
हे मानव....
अब तो तू जा जाग
अपनी प्रवित्ति त्याग
ऐसे न अपना मुंह मोड़
पर्यावरण से नाता जोड़।
अब तो प्रकृति भी थक चुकी
हे मानव....
अब तो तू जा जाग
अपनी प्रवित्ति त्याग
ऐसे न अपना मुंह मोड़
पर्यावरण से नाता जोड़।
माधवी गणवीर
बहुत सुंदर रचना गणवीर जी
ReplyDeleteबधाई !!!
🌷🌷🌷🌷🌷