कवि -शैलेन्द्र चेलक
शीर्षक - रिश्तों में "मैं "
सम्पर्क - 9098518976
पता - पेंडरवानी , बालोद , छ .ग .
रिश्तों में "मैं "
कभी घर छोटा था पर दिल बड़ा ,
अब घर बड़ा होने लगा तो
दिल सिकुड़ने लगा है ,
कभी अपनो के लिए
आग का दरिया लांघ जाते ,
अब अपनो से ही क्यूं जलने लगा है दिल ?
कभी भैया के कपड़े -पुस्तकें
सालभर बाद अपना हो जाता ,
अब साल भर में भी,
भैया को देने एक कपड़ा खरीदा नही जाता ,
कभी बापू की फटकार - मार भी प्यारा लगता ,
अब उनकी समझाईस भी ताने लगती है ,
कभी घर के चार खिलौने बारी - बारी खेल काटी बचपन ,
अब कटी-कटी है जिंदगी ,
जीवन खेल हो गया है ,
कभी अपनो की गलती पर भी ,
गैरों से लड़ने उद्यत होते ,
अब क्यूं गैरो के कहने से ,
अपना पराया हो जाता है ,
शायद संस्कारो से आगे हो गया है जमाना ,
कि विलासी जीवन या गैरों सी सोच ,
पता नही ,
कि मैं भी वही हूँ वे भी वही है ,
पर हर रिश्तों में मैं - मैं होने से ,
हर कोई है कहीं का कहीं ,
क्या यही समझदार होना है या मैं का रिश्तों में आना ?
- शैलेन्द्र चेलक -
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