नाम... सीमा गर्ग मंजरी
कविता... प्रकृति का रूप
राज्य... उत्तर प्रदेश
सम्पर्क नं...
कविता... प्रकृति का रूप
राज्य... उत्तर प्रदेश
सम्पर्क नं...
प्रकृति का रूप ~
आज धरती पर देखो नवरंग छा रहा है
बहारों से मिलकर निखार आ रहा है
बहारों से मिलकर निखार आ रहा है
नवल रूप में धरा भी मुस्कुराई
सुनहरी धूप भी हंसकर गुनगुनाई
सुनहरी धूप भी हंसकर गुनगुनाई
सूरज के संग सप्तरंग बसेरा
प्राची को लिये साथ डाला अपना डेरा
प्राची को लिये साथ डाला अपना डेरा
कमलिनी सुमन भी खिलने चले हैं
नवकुसुम भी मुख को चूमने लगे हैं
नवकुसुम भी मुख को चूमने लगे हैं
वृक्षों के अंग लग लतायें चली हैं
उन्नत हुआ जीवन वफायें खिलीं हैं
उन्नत हुआ जीवन वफायें खिलीं हैं
वो देखो, हरितम नव कोमल पात
छू लेने भर से चीकने लगते पात
छू लेने भर से चीकने लगते पात
फूलों को झुलाते पवन झकोरे
मस्त सुगंध महकी चमन के द्वारे
मस्त सुगंध महकी चमन के द्वारे
धरा के आँचल में रंग बिरंगी पुष्प बर्षा है
खिले संवरे रूप से हर मन हर्षा है
खिले संवरे रूप से हर मन हर्षा है
वसुधा भी आज अपने यौवन पे ठिठकी
धरकर रूप बंसती घटायें भी झुकती
धरकर रूप बंसती घटायें भी झुकती
धरती बनी है आज दुल्हन
कन, कन में प्रभु के सौन्दर्य का नर्तन
कन, कन में प्रभु के सौन्दर्य का नर्तन
मानो, कण, कण में ईश्वर ने जादू जगाया
करके अपना मेल सुन्दर प्रकृति को खिलाया
करके अपना मेल सुन्दर प्रकृति को खिलाया
✍ सीमा गर्ग मंजरी
मेरी स्वरचित रचना ©
मेरठ
मेरी स्वरचित रचना ©
मेरठ
बहुत ही सुन्दर वर्णन है👍
ReplyDeleteअति सुंदर
Deleteअद्भुत रचना दीदी
ReplyDeleteबहुत सुंदर Seema जी
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