नाम --- जितेश्वरी साहू सचेता
शीर्षक --- "सच का खरीददार"
सम्पर्क नं--
राज्य ----- छत्तीसगढ़
शीर्षक --- "सच का खरीददार"
सम्पर्क नं--
राज्य ----- छत्तीसगढ़
सच का खरीददार यहां नज़र नही आते,
चाहे चीख लो जितने असर नहीं आते।
चाहे चीख लो जितने असर नहीं आते।
बियाबान हुई अब ईमान की दुनिया,
दायरे में इसके कोई बसर नही आते।
दायरे में इसके कोई बसर नही आते।
वो हरिश्चन्द्र का दौर अलग था,
फेहरिस्त में अब ऐसे जिगर नही आते।
फेहरिस्त में अब ऐसे जिगर नही आते।
दुखों में उमड़ आते थे गांव के गांव,
हद में इसके कोई नगर नहीं आते।
हद में इसके कोई नगर नहीं आते।
अग्निपरीक्षाएं सीता की ही क्यों,
अनवरत इन कड़ियों में नर नहीं आते ।
अनवरत इन कड़ियों में नर नहीं आते ।
सांप्रदायिकता बरगद सा विशाल खड़ा,
समूल मिटाने आंधियों के लहर नहीं आते।
समूल मिटाने आंधियों के लहर नहीं आते।
पतझड़ दिलों में यूं ठहर-सा गया है ,
खिले हो गुलिस्तां वो मंज़र नही आते ।
खिले हो गुलिस्तां वो मंज़र नही आते ।
जितेश्वरी साहू सचेता
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