जाकर खुश थे सभी वहां, पर तुम जो एक मुर्झायी थी।
भगवान ने भी एक-दूजे की, दोस्ती वहीं पे सजायी थी।
दोस्तों में तेरा दुखी चेहरा, ऐसे न तुम्हें मैं देख सका।
कुछ खुशी तुम्हें दे सकूँ, ये ख्वाहिश अपने दिल में रखा।
खुशी चाहा हरदम तेरी क्यूँ, बात दिल की ये न बता पाया।
जाकर करीब भी मैं तेरे, क्यूँ अपना तुम्हें न बना पाया।।
पुष्पराज साहू "राज"
छुरा (गरियाबंद)
Nice line
ReplyDelete