दो वक्त रोटी की खातिर कमाता हूँ,
कड़ी धूप में पसीना से तर हो जाता हूँ।
क्या करूँ इस पेट की खातिर मैं मजबूर हूँ,
क्योकि मैं एक गरीब मजदूर हूँ।
पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे सर पर है,
रोज चूल्हे जलने को, रहता मेरा इंतजार घर पर है।
खून पसीना लुटा कमाने को ,
हर जगह मैं मशहूर हूँ,
हाँ मैं केवल एक गरीब मजदूर हूँ।
अपने बच्चो का हर अभिलाषा पूरा करने,
एक समय ही खाता हूँ,
तब जाकर कहीं मैं,
कुछ आमदनी अपना बचा पाता हूँ।
कल क्या होगा इस सोच में,
नींद भी नही ले पाता भरपूर हूँ,
हाँ मैं बेबश लाचार गरीब मजदूर हूँ।
लाख हो जीवन मे पैसे की कमी,
नही कभी भीख में मांगा हूँ,
कभी फोड़ा खदानों मे पत्थर,
तो कभी चलाया तांगा हूँ।
लमिली है मुझे अपने काम मे शोहरत भी कई,
फिर भी न हुआ कभी मगरूर हूँ
हाँ मैं वो ही एक गरीब मजदूर हूँ।
....✍अनिता सुभाष देशमुख©
1 मई 2019
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