Thursday, June 13, 2019

रुख के पीरा Written by अनिता सुभाष देशमुख

मोर अंतस म घलो जी बसे है,
ये पापी झन कांट मोला,
मोर होय ले ही तो तुमन जिंदा हो,
काबर समझ नई आय बात तोला।

25000 आदिवासी के में जान हरो,
मेहर  ही एखर जिनगी के पहचान हरो।

बादर घलो मोर होय ले,
बरसत हे,
मोर बिना ये धरती एक एक बूंद बर तरसत हे।

खुशी मनावत हे मोर लइका मन,
जब डोलत मोर एक एक पात हे।
ये लइका मन बर मोर होना,
ओखर जात हे।

भूख प्यास म नानकुन लइका,
मन ल लाद पीठ में,
मोर बर एमन लड़त हे,
मोला हरियर राखे पर ,
तोर पाँव ल घलो परत हे।

घाम के ये बेरा म,
मोर छैंहा म थिरावत हे,
मोला अपन दाई समझ,
दुख पीरा ल बिसरावत हे।

एखर पीरा ल देख,
थोकिन तो तरस खा,
नई आये बदरा जब बरखा म,
तिही ह कथस न थोरकिन बरस जा?

अब का होगे हे तोला,
तोर मति काबर मार गेहे,
जेऊन रुख तोला करत हे जुड़,।ओकर बर बइरी काबर छांड़ गेहे।

जेखर मेहा ठउर ओ,
जिये के ओखर सहारा हो,
जल संकट ल करेबर दूरिहा
वृक्षरोपन करलो मिलजुर,
जम्मो गली गुंजत बस
एके नारा ओ।

याद कर ओ दिन ल जब,
अकाल के बदरा छाइस हे,
भूख में थर्राइस पोटा ह,
प्यास म टोंटा सुखाइस हे।

ये परकीती ल रखे बर संतुलित,
रुख ल हमला बचाना हे,
जल के संकट ल ,
कई कोस दुरिहा हमी ला भगाना हे

निर्दयी लोगन मोर बिनती ल,
स्वीकार करव
हटो इंहा ले, इंहा ले भागे के
उपकार करव।

मन मे गठरी ल बांध,
कान लगाके सुन,
रुख नई होईस जब,
जाबे ते झुलस भून।

रुख राई ले बढ़के,
नई हे कोई मीत,
पाप के रस्ता ल छोड़,
निभाले मया के रीत।

Written by अनिता सुभाष देशमुख©

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