~~~~~~~~~~
अनजाने से प्रीत लगा पछताते क्यों हो।
बिछुड़ना है एक दिन दिल लगाते क्यों हो ।।
दिल का चैन रातों की नींद गँवाते क्यों हो ।
छुप छुप कर दुनिया से आँसू बहाते क्यों हो।।
कोई न अपना हुआ न होगा जग की रीत यही।
वह हाथ छुड़ा रहा है हाथ बढ़ाते क्यों हो ।।
जाने जाँ प्रिय कह देना सच्ची प्रीत नहीं ।
कुछ न मिलेगा उस रस्ते पे जाते क्यों हो ।।
दे के दगा चल देते दिल को दुखा करके ।
आऊँगा- कहने से बात में आते क्यों हो।।
अब कहते हो तंग दिल सनम मसहूर है ।
क्या करूँ मैं- मेरे दिल का क्या कुसूर है।।
केवरा यदु "मीरा "
राजिम
No comments:
Post a Comment