Thursday, June 13, 2019

दिल का क्या कुसूर by केवरा यदु "मीरा "


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अनजाने से प्रीत लगा पछताते क्यों हो।
बिछुड़ना है एक दिन दिल लगाते क्यों हो ।।

दिल का चैन रातों की नींद गँवाते क्यों हो ।
छुप छुप कर दुनिया से आँसू बहाते क्यों हो।।

कोई न अपना हुआ न होगा जग की रीत यही।
वह हाथ छुड़ा  रहा है  हाथ बढ़ाते क्यों हो ।।

जाने जाँ प्रिय कह देना सच्ची प्रीत नहीं ।
कुछ न मिलेगा उस रस्ते पे जाते क्यों हो ।।

दे के दगा चल देते दिल को दुखा करके ।
आऊँगा- कहने से बात में आते क्यों हो।।

अब कहते हो तंग दिल सनम मसहूर है ।
क्या करूँ मैं- मेरे दिल का क्या कुसूर है।।

केवरा यदु "मीरा "
राजिम

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