घर के अंगना ल जगमगावत जोती हरव
हाव मे उही एक कुँवर कली बेटी हरव।
पुतरी संग खेले के रिहिस मोर उमर,
बचपना के बाँचय रिहीस बड़ लम्बा सफर।
जेती जावंव गवाएं के डर म
पापा के हाथ ल धँरव
हाव में उही एक कुंवर कली बेटी हँरव।
एक दिन घर के मोहाटी म मेहा खेलत रेहेंव,
अब्बड़ घाम ल घलो खुश होके
झेलत रेहेंव।
तभे कका के एक झन संगवारी ह
आइस मोर आघु म,
किहिस चॉकलेट खवाहु नोनी,
चल बईठ मोर पाछु म।
चल देव संग म बइठ के
समझके कि मैहा घलो ओखरे भतीजी हँरव,
हव में कुंवर कली बेटी हँरव।
खजानी के लालच म,
लेगीस मोला अनते जघा,
जिहाँ नई रिहीस कोनो,
मोर सगा।
मोर अंग अंग ल ओहा,
हैवानियत के नजर ले देख लिस,
देखत देखत मोर कपड़ा ल,
चिर के फेक दिस।
मोर लाज ल ओ राक्षस ह,
एक क्षण म लूट डरिस,
भुखाय बघुआ के जईसन,
मोर म टूट परिस।
हाथ ल जोड़ छोड़े बर मेहा बिनती कँरव,
हाव में उही कुंवर कली बेटी हरव।
पोल खुल जाहि के डर म,
मोर बोटी बोटी करके कई चानी म बांट दिस,
अउ उही कर खन के गड्ढा,
मोला ओमा पाट दिस।
कभु उड़व चिरई जइसे,
आज बेजान बने रेती हँरव,
हाव मे उही कुँवर कली बेटी हँरव।
खुश रहाव ये सोचके जब में जिंदा रेहेंव,
में सुतई म तोपाय सुंदर मोती हरव,
हाव में उही कुंवर कली बेटी हरव।
न करव कभु पइदा कोनो घर बेटी,
आज बनके चंदैनी ये बिनती करत हव
अउ देना है जनम अगर त
मत मिलय अइसे राक्षस ल जगा ,
धरती माँ कर अरज में तोर पाँव परत हव।
श्रद्धांजली करे बर अर्पित,
एको मोमबत्ती मत जलावो,
अइसे राक्षस ल जड़ से मिटाय के,
सब झन मिलके किरिया आज खावो।
समझ बेटी ल बोजहा,
न एको अइसे औलाद ल उपजाय के खेती करव,
सुन लो दरद ल आज, मैं कराथो गोहार,
हाव मे उही कुंवर कली बेटी हरँव।
...✍अनिता सुभाष देशमुख
23/06/2019
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