जाने वाले ओ मुसाफिर,
इतनी बातें तो ,सुनते जा।
या तो तू मेरे ,दिल से चल दे,
या फिर मेरे ,दुनियाँ में आ ।।
तेरे दरस को अंखियां तरसे,
यादों में तेरी, आँसू बरसे।।
मुझको तड़पाने ,वाले सुन ,
मुझसे मिलन को तू तरसे।।
दिन गिन -गिन के ,महीने बीते,
महीने गिन -गिन ,बीते साल।
आके जरा तु ,देख ले मुझको,
तेरे बिन क्या, है मेरा हाल ?
दिल की लगी ,दिल्लगी न समझो,
ये तो मन की ,मन से रीत है।
दिल अपनी और प्रीत पराई,
यही विरह की गीत है।।
इन पथरीली, राहों से राही,
कितने आकर चले गए।
मेरी आँखें भी पथराई,
इश्क़ में उनके छले गए।।
राह तक रही, तेरा मैं तो,
कभी तो ,भूलकर आएगा।
प्यास अधूरी,जनम जनम की,
आके कभी वो बुझायेगा।।
रचनाकार✒
श्रवण कुमार साहू"प्रखर"
राजिम, गरियाबंद,(छ. ग.)
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