सागर की अथाह गहराई समेटे,
संघर्ष की तीखी तपन से,
सुझ-बुझ कर अपने लक्ष्य से,
जीनव की नैय्या सवारता पिता।
घर की आधार शिला,
संकट में रहमतों का साया,
हर कदम पर बन हम साया,
साथ निभाता हरदम पिता।
देवो को वरदान सा,
मां के अभिमान का,
हर जरूरत को पहचाना हुआ,
मेरा आत्मबल है पिता।
सुख-दुख तुममें समाया था,
किसी की रहमतों के साया सा,
पुण्य कर्म से पाया था।,
है जिसके बिना संसार,
पिता-पिता ही होता है।
कहलाता वही पिता।
परिवार का वह है आधार,
महफूज जिसके तले परिवार,
रौबदार,कड़कदार स्वभाव पर,
वात्सल्य की बौछार है पिता।
कवयित्री
श्रीमती माधवी गणवीर
राजनांदगांव
Sunday, June 16, 2019
पिता (Father's Day Special Poetry) by श्रीमती माधवी गणवीर
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