Thursday, June 20, 2019

गरीबी by कवि.कमलेश कौशिक

🌹 🌹

कुछ जिंदगियां ऐसी भी होती है।
जो चिथडो़ से शुरु होकर ।।
सिसकियों में दम तोड़ देती है।
आसमां तो है उड़ने को।।
पर कमबख्त यह गरीबी।
उड़ते परिंदों के बाजुओं को तोड़ देती है

सपने सब अपने हैं पर हकीकत में मंजिल से दूर है।
तंगहाली और बेबसी से कुछ मासूम बचपन।।
इस कदर मजबूर है।
कि सितारे गर्दिश में है।।
और भूख शरीर का कतरा कतरा निचोड़ देती है।
कुछ जिंदगियां.....

काबिलियत तो है पर हालात सुधरते नही।
जिन्हें निखर कर कोहिनूर होना चाहिए।।
वो फनकार झोफडी़यों में एडि़या रगड़ते है।
वो रंग सकते हैं कैनवास पे
  उड़ान के सपने।।
पर ब्रश पकड़ने से पहले।
सितमगर कलाइयां मरोड़ देती है।।
कुछ जिंदगी या ऐसी भी होती है।
जो चिथडो़ से शुरू हो कर।।
सिसकियों में दम तोड़ देती है..

भूख लाचारी, महंगाई और बीमारी।।
बरसों से गरीबों से है इसकी यारी।।
कुछ कोरे पन्ने हैरान है।
की अल्फ़ाज़ उभरते नहीं।।
बेंच डाला जिस्म का कतरा कतरा।
पर यह कर्ज़ कैसा है उतरते नहीं।।
यहां मांगने से दो जून की रोटी भी नहीं।
और कईयों को हजारों करोड़ देती है।।
कुछ जिंदगियां...

   ✍रचनाकार
कवि.कमलेश कौशिक
  😂कठलहा😂

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