बस्तर के सुदूर अंचलों में बसा, एक छोटा सा गांव।
जिसमें सुदर्शन राव की पुश्तैनी हवेली की सुंदरता, देखते ही बनती थी सुदर्शन बाबू एक मंझे हुए रंगकर्मी थे।
कुछ दिनों पहले उनकी एक लोककला मंच अनुगूंज की ख्याति दूर दूर तक फैली थी।
सुदर्शन बाबू 55 बरस के बुजुर्ग और सज्जन व्यक्ति थे।
हालांकि उनके ठाट बाट शान शौकत की झलक उनके रोबीला अंदाज से ही पता चल जाता था।
मगर अंदर से वे अत्यंत कला प्रेमी और साहित्यिक विचारधारा के थे।
उनकी लोकगीतों से सजे परंपरा और संस्कृति से रचे बसे अनुगूंज नामक प्रेम कहानी लोक कला मंच
माटी की महिमा और प्रेम गीतों को इस तरह से पिरोया गया था। कि एक बार देखने पर, बार बार देखने की इच्छा स्वता ही दर्शकों को खींचना की थी।
जब इस नाट्य संस्था कि शुरुआत हुई तो अनुराग और मोहनी इस संस्था के सबसे बेहतरीन कलाकार थे।
उनकी भाव भंगिमा से दर्शक भाव विभोर हो उठते थे बरसात के दिनों में 2 महीने तक इसकी अभ्यास की कक्षाएं लगा करती थी।
फिर पूरे साल इसी कार्यक्रम को दिखाया जाता था।
इस बार रिहर्सल शुरू होने के पहले।
मोहिनी की तबीयत अचानक खराब हो गई जो काफी लंबा समय तक चला।
इस कारण सुदर्शन बाबू काफी परेशान रहने लगे और एक दूसरे नायिका की खोज उनकी पहली जरूरत बन गई।
फिर इस संस्था में अचानक गुंजा नाम की लड़की का प्रवेश हुआ।
जिससे सुदर्शन राव की कुछ परेशानी कम हुई। गुंजा एक गरीब परिवार की लड़की थी लेकिन लोक कला मंचों में प्रस्तुति के लिए गहरी रुचि रखती थी।
वह एक 16 बरस की बेहद सुंदर और सुशील कन्या थी.
उसकी सुंदरता ऐसे कि देखने वाले अपनी नजर हटा ना सके या यूं कहा जाए कि कुदरत ने सारी कलाकृति उनके खूबसूरती में समाहित कर दिया था तो यह कोई अचरज की बात ना थी।
गोरा रंग सुनहरे बाल कटार से तीखे नैन नक्श थे साथ ही वह बहुत जल्दी लोगों से खुल मिल जाया करती थी।
रिहर्सल शुरू हुई कुछ ही दिनों में गुंजा ने आश्चर्यजनक रूप से सबको प्रभावित कर दिया।
वह जब नाचती थी तो लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे
अनुराग और गुंजा की जोड़ी बहुत सुंदर लगती थी या यूं कहा जाए कि दोनों एक दूसरे के लिए ही बने थे।
अनुराग बाबू 22 बरस का सुंदर सलोना युवक था जो बला की फुर्ती से नित्य करता था उस दौर में उसकी टक्कर का कोई नर्तक ना नहीं था।
दोनों की युगल जोड़ी ने सुदर्शन बाबू को काफी प्रभावित किया 2 महीने तक रिहर्सल चला फिर अनुगूंज के पहली प्रस्तुति का समय आया।
कहां जाता है की प्रस्तुति मील का पत्थर साबित हुआ है इस पूरे लोक कला मंच ने, इतना सुंदर प्रस्तुति दिया कि लोगों में उत्साह और रोमांच चरम सीमा तक पहुंच गया हर कोई अनुगूंज की ही चर्चा करता था.
अनुगूंज की बढ़ती लोकप्रियता ने उनके समकक्ष नाट्य मंचों को काफी नुकसान पहुंचाया।
अनुराग और गुंजा इतने घुल मिल गए थे कि,एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे।एक अछूता प्रेम इन दोनों के मन में कब घर कर गया इस बात से दोनों ही अनजान थे उन्हें कभी अपने प्रेम को लफ्जों से बयां करने की जरूरत ही नहीं पड़ी, वे खुद एक दूसरे के पूरक हो गए।
इस तरह सफलता की सीढ़ी चढ़ते अनुगूंज ने 3 साल का समय गुजार दिया अनुगूंज की ख्याति प्रदेश स्तर से बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया।
हर जगह इनकी तारीफ के पुल बांधे जाते थे। इस मंच से अनुगूंज को बहुत सारे प्रशस्ति पत्र एवं ट्रॉफी भी मिले।
मगर एक तरफ कहानी की नाटकियता कहीं और ही मुड़ रही थी। बिहारी जय लाल सिंह इस बात से हमेशा दुखी रहते थे और अनुगूंज की सफलता से हमेशा क्रोधित रहते थे।
बिहारी जय लाल सिंह भी एक रंगकर्मी थे कहा जाता है कि एक समय उनके लोक कला मंच के समकक्ष कोई टिकता ही नहीं था।
फिर जब से सुदर्शन बाबू ने अनुगूंज की प्रस्तुति प्रारंभ की।
बिहारी लाल की हालत काफी दयनीय हो गए,
उनको अत्यधिक आर्थिक क्षति हुई।
उन्होंने कई बार अच्छे नायक नायिका की भर्ती की पर अनुगूंज के सामने कोई नहीं टिके।
इसी बीच बिहारी बाबू ने अनुराग और गुंजा को चुपके से अपने पास बुलाया और अपने नए नाटक मंडली में शामिल होने की बात कही।
और इसके लिए वह उसे दोहरी रकम भी देने को तैयार थे पर वह दोनों सुदर्शन बाबू के साथ धोखा नहीं करना चाहते थे।
इसलिए उन्होंने उन्हें साफ शब्दों में इंकार कर दिया, इस बात ने बिहारी लाल की शान शौकत को बहुत ठेस पहुंचाया और वह किसी तरह से अनुगूंज को बिखेरने की जुगत में लग गया।
उन्हीं दिनों अनुगूंज ने कामयाबी की एक और मिसाल कायम की।
विदेशों से उनके कार्यक्रम के संदेश आने लगे इससे उनको काफी शान शोहरत और रुपए भी मिलते सुदर्शन बाबू ने 1 महीने का कार्यक्रम का टेंडर साइन कर लिया।
1 महीने की विदेश यात्रा सुनके अनुराग और गुंजा काफी खुश हुए उन्हें तो हमेशा पास रहने की मौके की तलाश रहता था।
विदेशों में अनुगूंज ने अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किए साल भर में उन्होंने कई देशों की यात्रा की और हर जगह से साधुवाद लेकर लौटे।
आज अपनी आखिरी प्रस्तुति देकर अनुगूंज अपने पूरे लोक कला मंच टीम के साथ वापस लौट रहे थे मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
बस्तर में उन दिनों नक्सलाइट गतिविधियां चरम सीमा पर थी।
बिहारी बाबू ने नक्सलियों के साथ मिलकर के रास्ते में जंगलों के बीच , खाई नुमा पगडंडी में लैंड माइंस बिछा दिए यह काम उन्होंने बड़े ही सावधानी के साथ अंजाम दिया।
अनुगूंज की पूरी टीम बस से जब इस रास्ते से गुजर रही थी तो एक जोर का धमाका हुआ और बस के उड़ते
चिथड़े हवा में बिखर गए।
27 कलाकारों से सुसज्जित लोक कला मंच की पूरी टीम अनुगूंज एक पल में जमींदोज हो गया।
कहा जाता है आज भी उस स्थान पर, संगीत की मधुर लहरियां प्रस्फुटित होती है नृत्य करते प्रेमी जोड़े की घुंघरू की आवाज ढोलक मृदंग तबला शहनाई आज भी वहां बजते हैं
अनुराग और गुंजा की अमर प्रेम कहानी के किस्से आज भी उन वादियों में अनु गुंजित होती है।
✍रचनाकार ✍
कवि.कमलेश कौशिक
😃 कठलहा 😄
8827292703..
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