Thursday, June 27, 2019

मीरा के दोहे by केवरा यदु "मीरा "

वाणी मधुरस घोलिये, वाणी मीठी होय ।
वाणी से हरषे हृदय,  वाणी से ही रोय ।।

परुष वचन मत बोलिए ,  वाणी है अनमोल ।
सोच समझ कर बोलना , आम नीम को तोल ।।

परुष वचन घर तोड़ता,  करता है बिखराव ।
परुष वचन दे जख्म तो ,  मीठा भरता घाव ।।

ऊँचे पद पैसा अधिक, कड़वी किन्तु जुबान ।
होते अपमानित सदा, घटे मान सम्मान ।।

वाणी ऐसी बोलिये,  ज्यों मिसरी  का घोल ।
बनती है पहचान भी, सोच समझ मुख खोल ।।

केवरा यदु "मीरा "
राजिम

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