विशाल मेरा दिल ।
जो आता मुझमें जाता मिल ।
गंदी नाली,नदियों को भी अपनाता हूं।
उनको आश्रय देकर निर्मल बनाता हूं।
कितने जीव- जंतुओं का दूख,
हर लेता हूं हंसकर ।
हूं मैं समंदर ।
किसी पर बरसता नहीं ।
घमंड में गरजता नहीं ।
मान या न मान ।
हूं सबकी जांन ।
शांति मेरी पहचान ।
अकर्मण्य नहीं मैं,
न छल कपट मेरे अंदर।
हूं मैं समंदर ।
बोल नहीं सकता कोई,
है मुझमें कितना पानी ।
नहीं कोई तोल सकता,
मुझमें है कितनी जवानी ।
एक पल में डूबो दुं जग को,
है मुझमें इतनी ताकत ।
सांथ मेरे खिलवाड़ हुआ तो,
दिखाता हूं अपनी औकात ।
मैं नहीं वश में किसी के,
राजा हो या सिकंदर ।
हूं मैं समंदर ।
✍️कृष्ण कुमार कश्यप
शिक्षक
गरियाबंद (छत्तीसगढ़)
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