Friday, June 14, 2019

आबे बदरिया by कवि.कमलेश कौशिक

🌹🌹

झमकत मझंनीया आबे।
गरजत,बदरिया..
भभकत तन ला..
    भिगोई देबे ना.।।2
अतरत बुंद हा..
छिटक छिटक,जाये..
मन के मिलौना..
    मिलाई देबे ना..

आबे बदरिया.तोर आस लागे ना.
  केवची करेजा.जूडा़ई देबे ना
   मया के गठरी.
  तैय जोर लेबे ना..
सरी उमर बर तै मोर,होबे ना..
भभकत तन ला.....

झुमरत हे गोरी..
बाजत हे.पैजनिया.
रतिहा सुध लामे..होगे रे मझनिया..
घुमरत सजनिया आबे..
मटकत कमरिया..
गुरतुर बोली.तोर निक लागे ना.
भभकत तन ला..
  जूडो़ई देबे ना..

    ✍रचनाकार✍
कवि.कमलेश कौशिक
   😂कठलहा😂
Mo.8827292703

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